Karnataka Vote Theft Case Update : 2022 के ‘वोट चोरी’ मामले की जांच फिर शुरू करेगी कांग्रेस सरकार; चिलुमे ट्रस्ट के खिलाफ कोर्ट में पेश की आपत्तियां

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Karnataka Vote Theft Case Update : बेंगलुरु : कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने बीजेपी शासनकाल के दौरान हुए कथित वोटर डेटा चोरी घोटाले की जांच को फिर से पटरी पर लाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने पूर्व महाधिवक्ता (Advocate General) प्रो. रवि वर्मा कुमार को इस मामले में विशेष वकील नियुक्त किया है। उनका मुख्य कार्य हाईकोर्ट में उन याचिकाओं का विरोध करना है, जिनकी वजह से 22 दिसंबर 2022 से पुलिस जांच पर रोक (Stay) लगी हुई है।

क्या है ‘वोट चोरी’ का पूरा मामला?

नवंबर 2022 में बेंगलुरु पुलिस ने चिलुमे एजुकेशनल कल्चरल एंड रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की थीं। आरोप था कि:

  • इस ट्रस्ट ने चुनाव आयोग (EC) के मतदाता जागरूकता कार्यक्रम (SVEEP) की आड़ में फर्जी आईडी कार्ड बनाकर घर-घर जाकर डेटा इकट्ठा किया।

  • निजी ऐप ‘डिजिटल समीक्षा’ के जरिए मतदाताओं की निजी जानकारी विदेशी सर्वर पर स्टोर की गई।

  • कांग्रेस का आरोप है कि इस डेटा का उपयोग बीजेपी नेताओं के इशारे पर मतदाता सूची में फेरबदल (नाम हटाने या जोड़ने) के लिए किया गया।

राहुल गांधी के आरोपों ने बढ़ाई हलचल

अगस्त 2025 में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 1 लाख फर्जी वोट जोड़ने का आरोप लगाया था। इसके बाद सितंबर में कलबुर्गी के आलंद क्षेत्र में भी करीब 6,000 मतदाताओं के नाम अवैध रूप से हटाने का मुद्दा उठाया गया। इन आरोपों के बाद कर्नाटक सरकार ने जांच को पुनर्जीवित करने के लिए 27 नवंबर 2025 को विशेष वकील की नियुक्ति का आदेश जारी किया।

जांच की वर्तमान स्थिति

  • महादेवपुरा केस: हाईकोर्ट ने दिसंबर 2022 में गिरफ्तार अधिकारियों की याचिका पर जांच पर रोक लगा दी थी। अब सरकार इस रोक को हटाने के लिए हलफनामा दायर कर रही है।

  • आलंद केस: इस मामले में सीआईडी की एसआईटी (SIT) ने दिसंबर 2025 में चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें पूर्व बीजेपी विधायक सुभाष गुट्टेदार और उनके बेटे सहित कई अन्य लोगों को नामजद किया गया है।

अगला कदम

हाईकोर्ट ने सरकार को अपनी आपत्तियां दर्ज करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। यदि कोर्ट पुलिस जांच पर लगा स्टे हटा देता है, तो चिलुमे ट्रस्ट और तत्कालीन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

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