नई दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए भेदभाव विरोधी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी रोक लगाते हुए उन्हें फिलहाल लागू न करने का आदेश दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत में इन नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “ऐसा मत कीजिए, हम पीछे जा रहे हैं।”
सामान्य वर्ग के छात्रों के भेदभाव का आरोप
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को समान संरक्षण नहीं देते और उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव का दोषी मानते हैं। याचिका में कहा गया कि नियमों में केवल OBC, SC और ST वर्ग को संभावित पीड़ित के रूप में परिभाषित किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।
समानता समितियों को लेकर विवाद
नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में “समानता समितियों” का गठन अनिवार्य किया गया है, जिनमें OBC, SC, ST, महिला और दिव्यांग प्रतिनिधित्व जरूरी है। आलोचकों का कहना है कि नियमों में स्पष्ट प्रक्रिया का अभाव है और इनके दुरुपयोग की आशंका बनी हुई है।
CJI की अहम टिप्पणी: अनुच्छेद 14 की कसौटी
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि नियम 3(e) में पहले से भेदभाव की व्यापक परिभाषा मौजूद है, ऐसे में 3(c) जैसी अलग धारा बनाना समाज में विभाजन पैदा करता है। इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत यह परखेगी कि क्या ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार के अनुरूप हैं या नहीं।
SC का अंतरिम आदेश: 2012 के नियम लागू
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कहा कि जब तक मामले की अंतिम सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक UGC के 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे। अदालत ने केंद्र सरकार से इस मामले में 19 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है।
देशभर में जारी विरोध और सरकार की सफाई
UGC के नए नियमों को लेकर कई राज्यों में छात्रों और सामाजिक संगठनों द्वारा प्रदर्शन किए जा रहे हैं। वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया है कि नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं होगा।











