खैरागढ़ : कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का अब पर्दा उठ चुका है, जब खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिला कांग्रेस के अध्यक्ष गजेंद्र सिंह ठाकरे ने अचानक पद से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा उस वर्चस्व की लड़ाई को प्रमाणित करता है, जो लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई थी। गजेंद्र सिंह ठाकरे ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज को भेजे गए पत्र में ‘व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कारणों’ का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया।
राजनीतिक बदलाव की शुरुआत:
गजेंद्र सिंह ठाकरे का इस्तीफा कांग्रेस के लिए एक बड़ा संदेश है, खासकर खैरागढ़-छुईखदान-गंडई क्षेत्र में। जब से ठाकरे को इस क्षेत्र की जिला कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तब से संगठन में दरारें साफ तौर पर दिखने लगी थीं। पार्टी में विभिन्न गुटों के बीच शक्ति संघर्ष और आरोप-प्रत्यारोप ने क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया। ठाकरे के इस्तीफे ने इस वर्चस्व की लड़ाई को और ज्यादा स्पष्ट कर दिया है, जिससे आने वाले समय में पार्टी की रणनीति और आंतरिक राजनीति पर प्रभाव पड़ सकता है।
खैरागढ़ क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी के भीतर गहरी राजनीतिक गतिरोध और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आ रही थीं। यह इस्तीफा इस बात का संकेत है कि पार्टी में चल रहे मतभेद अब किसी सीमा को पार कर गए हैं। हालांकि गजेंद्र सिंह ठाकरे ने इस्तीफे के कारणों को व्यक्तिगत और पारिवारिक बताया है, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पार्टी में चल रही आंतरिक कलह का असर उनका इस्तीफा होने का प्रमुख कारण हो सकता है।
आने वाले समय में क्या होगा?
अब गजेंद्र सिंह ठाकरे के इस्तीफे के बाद यह सवाल उठता है कि क्या पार्टी के अंदर की यह कलह और गुटबाजी आगे भी जारी रहेगी या इस पर काबू पाया जाएगा। आगामी विधानसभा चुनावों और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को देखते हुए इस इस्तीफे का असर कहीं ना कहीं राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा।














