Raja Rammohan Roy : उच्च शिक्षा मंत्री ने मांगी माफी : राजा राममोहन राय को ‘अंग्रेजों का दलाल’ कहने पर किया खेद व्यक्त

Raja Rammohan Roy :  शाजापुर (किशोर नाथ राजगुरु )। मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने समाज सुधारक राजा राममोहन राय को लेकर दिए गए अपने विवादित बयान पर अगले ही दिन माफी मांग ली है। मंत्री परमार ने शनिवार, 15 नवंबर को आगर मालवा में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान राजा राममोहन राय को “अंग्रेजों का दलाल” कह दिया था। यह बयान सामने आते ही राज्य की राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में विवाद खड़ा हो गया। विवाद को बढ़ता देख, मंत्री ने रविवार को शुजालपुर में एक प्रेस वार्ता आयोजित कर अपनी टिप्पणी को गलत बताते हुए खेद व्यक्त किया।

‘फ्लो में निकल गया’ कहकर टिप्पणी पर जताया दुख

रविवार को शुजालपुर में मीडिया से बात करते हुए मंत्री इंदर सिंह परमार ने स्पष्ट किया कि राजा राममोहन राय एक महान समाज सुधारक थे और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी यह विवादित टिप्पणी “फ्लो में बोला हुआ वाक्य” थी, जिसके लिए उन्हें गहरा दुख है। मंत्री ने कहा कि वह इस टिप्पणी के लिए “प्रायश्चित” करते हैं और उनका उद्देश्य किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का अपमान करना नहीं था। इस बयान के बाद विपक्षी दलों द्वारा हमलावर रुख अपनाने की आशंका थी, जिसे मंत्री ने समय रहते टाल दिया।

Raja Rammohan Roy :  धर्मांतरण के कुचक्र से जोड़कर दिया था बयान

आगर मालवा में दिए गए अपने मूल बयान में मंत्री परमार ने आरोप लगाया था कि अंग्रेजी शासन मिशनरी स्कूलों के माध्यम से धर्मांतरण का कुचक्र चला रहा था। उन्होंने कहा था कि कई लोग इस साजिश में शामिल थे, और राजा राममोहन राय भी अंग्रेजों के समर्थन वाली उसी श्रेणी में आते थे। मंत्री का कहना था कि अंग्रेजों ने कई लोगों को फर्जी समाज सुधारक के रूप में पेश किया ताकि धर्मांतरण को बढ़ावा देने वालों को आगे बढ़ाया जा सके। इसी संदर्भ में उन्होंने उन्हें “अंग्रेजों का दलाल” कह दिया था।

बिरसा मुंडा ने किया सबसे बड़ा संघर्ष

अपने भाषण में मंत्री ने बिरसा मुंडा के योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि अंग्रेजों के दौर में मिशनरी स्कूल ही शिक्षा का साधन थे, और उन्हीं में धर्मांतरण की कोशिशें भी होती थीं। उन्होंने दावा किया कि बिरसा मुंडा ने न केवल इन गतिविधियों का विरोध किया, बल्कि आदिवासी समाज की आस्था और पहचान को बचाने के लिए “सबसे बड़ा संघर्ष” किया। साथ ही, उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर असली आदिवासी नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास को दबाने, जबकि धर्मांतरण को आसान बनाने वालों को महान बताने का आरोप भी लगाया था।

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