Delhi News : दिल्ली में कुत्तों पर विवाद, मुंबई में कबूतरों पर टकराव… दो बड़े शहरों में तेज हुई पशु अधिकारों की जंग

Sanjay Sahu
Delhi News

Delhi News : दिल्ली और मुंबई में इस वक्त दो अलग-अलग लेकिन गर्माए हुए विवाद चर्चा में हैं — एक आवारा कुत्तों को लेकर और दूसरा कबूतरों को दाना खिलाने को लेकर। दोनों ही मामलों में अदालतों के ताज़ा फैसलों ने बहस छेड़ दी है, जिसमें जनसुरक्षा, स्वास्थ्य और पशु अधिकारों के मुद्दे टकरा रहे हैं।

Delhi News : दिल्ली: आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश

Delhi News : सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें डॉग शेल्टर में भेजने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने नसबंदी, वैक्सीनेशन और कुत्ते पकड़ने में बाधा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। यह कदम बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया, क्योंकि हाल के वर्षों में कुत्तों के हमलों और रेबीज़ के मामलों में बढ़ोतरी हुई है।

Delhi News : फैसले पर विरोध की आवाज़ें

Delhi News : पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस आदेश को “अव्यावहारिक” बताया। उनका तर्क है कि तीन लाख से अधिक कुत्तों को शेल्टर में रखने पर 15,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा और बड़ी संख्या में कर्मचारियों की जरूरत होगी। उन्होंने पर्यावरणीय असर का भी ज़िक्र किया — जैसे कुत्ते हटने पर बंदरों और चूहों की समस्या बढ़ सकती है।राहुल गांधी ने भी इस कदम को “क्रूर और अदूरदर्शी” कहा और सुझाव दिया कि नसबंदी, वैक्सीनेशन और सामुदायिक देखभाल से ही संतुलन बनाया जा सकता है।

Delhi News : मुंबई: कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक

Delhi News : बॉम्बे हाईकोर्ट ने कबूतरों को दाना खिलाने पर पाबंदी लगाई है, यह कहते हुए कि कबूतरों की बीट से सांस की गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं। आदेश के बाद बीएमसी ने कई कबूतरखाने बंद कर दिए और दाना डालने वालों पर जुर्माना लगाया।

Delhi News : धार्मिक और सामाजिक विरोध

Delhi News : जैन समाज और पक्षी प्रेमियों का कहना है कि कबूतरों को दाना खिलाना उनकी धार्मिक परंपरा और करुणा का हिस्सा है। जैन मुनि नीलेश चंद्र विजय ने चेतावनी दी कि वे इस रोक के खिलाफ भूख हड़ताल करेंगे और जरूरत पड़ी तो “हथियार भी उठाएंगे”। उनका कहना है कि धर्म में चींटी से लेकर हाथी तक सभी जीवों की रक्षा का आदेश है और इसे रोका नहीं जा सकता। यह बहस अब सिर्फ कानून और प्रशासन का मुद्दा नहीं रही, बल्कि इसमें जनसुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन, स्वास्थ्य और धार्मिक आस्थाएं—सब शामिल हो गए हैं।

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