Singrauli News : सिंगरौली : सिंगरौली,ऊर्जाधानी के नाम से पहचाना जाने वाला जिला एक बार फिर कोयले में मिलावट के बड़े खेल को लेकर सुर्खियों में है। ताजा खुलासे में पता चला है कि झारखंड से फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारी मात्रा में डस्ट (कोयला कचरा) मंगवाकर सिंगरौली के गोंदवाली क्षेत्र में कोयले में मिलाया जा रहा था। इस मिलावट के जरिए कोयला माफिया करोड़ों रुपये का अवैध लाभ कमा रहे हैं। पुलिस और खनिज विभाग की टीम ने कल रात औचक कार्रवाई करते हुए कई गाड़ियों को पकड़ा है जो झारखंड से सतना के नाम पर फर्जी पेपर बनवाकर डस्ट लेकर सिंगरौली पहुंची थीं।
Singrauli News : जांच में सामने आया है कि इन गाड़ियों का वास्तविक गंतव्य सतना नहीं, बल्कि सिंगरौली के गोंदवाली क्षेत्र था, जहां पहले से ही सेटिंग कर कोयले में डस्ट की मिलावट की जा रही थी। पकड़ी गई गाड़ियों के मालिकों से पूछताछ में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यह काम किसी छोटे स्तर का नहीं, बल्कि एक लंबी श्रृंखला के तहत हो रहा था जिसमें कई रसूखदार लोगों की संलिप्तता है। गाड़ियों के मालिक ने स्वयं माना है कि गोंदवाली में एक बड़ी “सेटिंग” है, जिसके चलते यह धंधा लंबे समय से बेरोकटोक चल रहा है।
Singrauli News : कोयला माफिया और राजनीतिक संरक्षण
Singrauli News : सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यह खेल इतने लंबे समय से चल रहा था, तो जिम्मेदार विभाग क्यों चुप थे? अब यह चर्चा जोरों पर है कि इस गोरखधंधे को एक स्थानीय भाजपा नेता का संरक्षण प्राप्त है, जिसने कोयला माफिया को राजनीतिक सुरक्षा दी हुई है। यह नेता कौन है और किस स्तर की मिलीभगत इसमें है, इसका पता लगाना प्रशासन और जांच एजेंसियों की प्राथमिकता बन गई है। जांच एजेंसियों को मिले प्रारंभिक साक्ष्यों के मुताबिक माफिया झारखंड से डस्ट लाने के लिए फर्जी बिल, चालान और जीएसटी दस्तावेज तैयार कर रहे थे, जिससे यह दिखाया जा सके कि डस्ट सतना के किसी निर्माण कार्य हेतु लाई जा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि सतना सिर्फ नाम के लिए इस्तेमाल हो रहा था और असल मिक्सिंग यूनिटें सिंगरौली के आसपास की थीं।
Singrauli News : लाखों की नहीं, करोड़ों की हेराफेरी
Singrauli News : प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिदिन दर्जनों ट्रकों से डस्ट लाकर कोयले में मिलाया जा रहा था। इस मिलावट से कोयला माफिया गुणवत्ता में कमी लाकर भी बाजार दरों पर कोयला बेचते थे, जिससे उन्हें प्रति ट्रक हजारों का फायदा होता। यह आंकड़ा महीनों में जाकर करोड़ों तक पहुंच गया है। अब यह मामला सामने आने के बाद प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या यह माफिया इतने लंबे समय से बिना किसी मिलीभगत के यह कारोबार कर सकता था? क्या स्थानीय अधिकारी जानबूझकर आंखें मूंदे हुए थे?











