Kondagaon News: जंगलों में छिपे औषधीय ज्ञान को मिलेगी नई पहचान, 309 पारंपरिक वैद्यों को मिला प्रमाण पत्र, मंत्री केदार कश्यप ने कही ये बड़ी बात

Sanjay Sahu
Kondagaon News

Kondagaon News: कोण्डागांव: छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा कोण्डागांव स्थित ऑडिटोरियम में पारंपरिक वैद्य स्वैच्छिक प्रमाणन अंतर्गत प्रमाण पत्र वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में वन जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप, छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परम्परा औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने अध्यक्षता की, वहीं बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं कोंडागांव विधायक सुश्री लता उसेंडी और औषधि पादप बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला, सीईओ जे. ए.सी.एस राव भी मौजूद रहे। कार्यक्रम में प्रदेश के 309 पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान कर उनके पारंपरिक ज्ञान, अनुभव और सेवाभाव का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को संरक्षित करना, वैद्यराजों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण करना तथा इस अमूल्य विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

 

 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान करना अत्यंत हर्ष का विषय है। हमारी जड़ें जितनी मजबूत होंगी, हमारी संस्कृति और परंपराएं उतनी ही समृद्ध होंगी। यदि हम केवल आधुनिकता, बाहरी दिखावे और वर्तमान आवश्यकताओं पर ध्यान देंगे तथा अपनी परंपराओं की उपेक्षा करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध संस्कृति और इतिहास की विरासत नहीं सौंप पाएंगे। उन्होंने कहा कि आज भी दुनिया की 80% जनता प्राचीन उपचार पद्धतियों से चिकित्सा करा रही है। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को पीढ़ियों से सहेजकर रखने वाले वैद्यराजों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सभी प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले वैद्यों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

वन मंत्री ने कहा कि पारंपरिक वैद्यों का ज्ञान प्राकृतिक अनुभवों, वनस्पतियों की पहचान और पीढ़ियों से अर्जित समझ पर आधारित है। यह ऐसा ज्ञान है, जिसे केवल औपचारिक शिक्षा और डिग्रियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि वैद्यराजों के अनुभवों और औषधीय वनस्पतियों से संबंधित जानकारी को व्यवस्थित रूप से संकलित कर उसका दस्तावेजीकरण किया जाए, ताकि यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

 

 

उन्होंने कहा कि हमारे आसपास उपलब्ध अनेक पेड़-पौधों, फल-फूलों, जड़ों और वन उत्पादों में उपयोगी गुण हैं। पहले ग्रामीण जीवन में इनका उपयोग खान-पान और पारंपरिक उपचार में सहज रूप से किया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण इनसे दूरी बढ़ती जा रही है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पारंपरिक खान-पान और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को फिर से पहचानें तथा उनके वैज्ञानिक अध्ययन और उचित उपयोग को प्रोत्साहित करें।

श्री कश्यप ने कहा कि कोदो, कुटकी, रागी और अन्य पारंपरिक मोटे अनाज हमारी खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। आज इनके महत्व को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भी मिलेट्स के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर जा रहा है। उन्होंने कहा कि स्वाद के साथ-साथ भोजन के पोषण मूल्य और स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव को भी महत्व देना चाहिए। बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों ने भी हमारी पारंपरिक खाद्य संस्कृति, स्थानीय सब्जियों और विलुप्त होती खान-पान की परंपराओं को फिर से पहचानने का अवसर प्रदान किया है।

आजीविका संवर्धन की संभावनाओं पर भी जोर दिया

वन मंत्री ने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के साथ उसके आजीविका संवर्धन की संभावनाओं पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय वन उत्पादों, औषधीय पौधों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं उपयोगिता को पहचानकर उनकी बेहतर ब्रांडिंग, प्रसंस्करण और विपणन किया जा सकता है। इससे स्थानीय संसाधनों को व्यापक बाजार मिलेगा और ग्रामीण समुदायों की आजीविका के अवसर भी बढ़ेंगे। उन्होंने साल बीज सहित अन्य वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन की संभावनाओं पर कार्य करने का आग्रह किया।

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि पंचायतों की उपलब्ध भूमि, घरों की बाड़ियों और अन्य उपयुक्त स्थानों पर फलदार वृक्षों के साथ औषधीय पौधों का रोपण भी प्रोत्साहित किया जाए। इससे स्थानीय स्तर पर औषधीय वनस्पतियों की उपलब्धता बढ़ेगी और उनके संरक्षण में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए दस्तावेजीकरण, जनजागरूकता और अगली पीढ़ी को उससे जोड़ने की दिशा में समन्वित प्रयास आवश्यक हैं।

छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय और वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में पारंपरिक वैद्यों के प्रमाणन और उनके ज्ञान के दस्तावेजीकरण की दिशा में पहल की गई है। उन्होंने बताया कि शासन की मंशा है कि दूरस्थ वनांचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में पारंपरिक वैद्यराजों की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचान मिले तथा उनके अनुभव और सेवाओं को उचित प्रोत्साहन प्रदान किया जाए।

श्री मरकाम ने बताया कि बोर्ड द्वारा विभिन्न वन मंडलों और जिलों में बैठकें आयोजित कर पारंपरिक वैद्यों से संवाद किया गया। इन बैठकों में वैद्यराजों के अनुभवों, उनकी समस्याओं और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के संरक्षण से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप प्रमाणन के प्रथम चरण में 309 वैद्यों को प्रमाण पत्र प्रदान किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि बोर्ड का लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक प्रदेश के एक हजार पारंपरिक वैद्यों का प्रमाणन पूरा करना है।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान का दस्तावेजीकरण समय की आवश्यकता है। इस संबंध में हाल ही में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु से हुई मुलाकात का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ने भी पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और सेवा परंपरा को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया तथा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं जारी रखें: मरकाम

श्री मरकाम ने वैद्यराजों से अपील की कि वे निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं जारी रखें और औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण में भी सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि वन विभाग के अधिकारियों और पारंपरिक वैद्यों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए जिलों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य वैद्यों को आवश्यक वनस्पतियों की पहचान, संग्रहण और संरक्षण के संबंध में जानकारी देना है।

उन्होंने कहा कि औषधीय पौधों का संग्रहण इस तरह किया जाना चाहिए कि उनकी प्राकृतिक वृद्धि प्रभावित न हो। वनस्पतियों का अंधाधुंध दोहन करने के बजाय समुचित दोहन जरूरी है, ताकि भविष्य में भी ये प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध बने रहें।

बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एवं कोण्डागांव विधायक सुश्री लता उसेंडी ने कहा कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने पर हम चिकित्सकों और वैद्यों को याद करते हैं। बीमारियों की रोकथाम और स्वस्थ जीवनशैली के लिए पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों तथा संतुलित खान-पान के महत्व को समझना भी आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने अपने दैनिक जीवन और भोजन में स्थानीय अनाज, वन उपज तथा प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को स्थान दिया था। समय के साथ खान-पान की आदतों में बदलाव आया और हम अपनी अनेक परंपराओं से दूर होते चले गए।

उन्होंने कहा कि आज मिलेट्स और पारंपरिक अनाज के पोषण संबंधी महत्व को फिर से पहचाना जा रहा है। कोदो, कुटकी और रागी जैसे अनाज हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैं, लेकिन आधुनिक खान-पान की आदतों के कारण इनका उपयोग कम होता गया। आवश्यकता है कि इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को दैनिक भोजन में फिर से स्थान दिया जाए और इनके उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए।

संकलित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक : सुश्री उसेंडी

सुश्री उसेंडी ने पारंपरिक औषधीय ज्ञान को संरक्षित रखने में वैद्यराजों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने अनेक औषधीय वनस्पतियों और उनके उपयोगों का ज्ञान अनुभव के आधार पर संजोकर रखा था। समय के साथ यह ज्ञान सीमित होता गया। अब इसे व्यवस्थित रूप से संकलित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि पारंपरिक वैद्यों के अनुभवों का उपयोग जनजागरूकता, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को बढ़ावा देने में किया जा सकता है। उन्होंने वैद्यराजों से आग्रह किया कि वे अपने ज्ञान और अनुभवों को साझा करें, ताकि स्थानीय समुदायों में स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़े। साथ ही उन्होंने सभी प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाले वैद्यों को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि वे स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहित करने पर जोर : अंजय शुक्ला

बोर्ड के उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला ने सरकार द्वारा पारंपरिक एवं आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियों के संरक्षण, वैद्यराजों के कल्याण तथा उनके ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहित करने के लिए वैद्यराजों की पहचान, प्रमाणन और उनके अनुभवों के संरक्षण की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

 

कार्यक्रम में इनकी रही उपस्थिति

 

Kondagaon News: कार्यक्रम में पूर्व विधायक सेवकराम नेताम, जिला पंचायत अध्यक्ष रीता शोरी, नगर पालिका अध्यक्ष नरपति पटेल, राज्य तीरंदाजी संघ के उपाध्यक्ष दीपेश अरोरा, जितेन्द्र सुराना, अश्वनी पाण्डेय, प्रवीण सांखला, सोनामणि पोयाम, बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे.सी.एस. राव, वन मंडलाधिकारी चूड़ामणि सिंह, सीटीटीसी के डायरेक्टर श्री मोहन नायर सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि, संबंधित विभागों के अधिकारी और बड़ी संख्या में पारंपरिक वैद्य उपस्थित रहे।

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