बैतूल। Nishaanebaz.com-Betul Forest Division Irregularities: मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में स्थित पश्चिम वन मंडल की गवासेन रेंज से वन विभाग में भ्रष्टाचार और सरकारी संपत्ति के गबन का बड़ा मामला उजागर हुआ है। गवासेन रेंज में चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों में डिप्टी रेंजर बाथम पर व्यापक पैमाने पर अनियमितताओं और शासकीय सामग्री को खुर्द-बुर्द करने के गंभीर आरोप लगे हैं। स्थानीय सूत्रों व शिकायतकर्ताओं के अनुसार, रेंज के कुरसना, परिक्षेत्र भवन परिसर और अजई क्षेत्र में हुए निर्माण कार्यों के दौरान पुराने भवनों से निकली लाखों रुपये की कीमती इमारती लकड़ी, चौखट, दरवाजे और अन्य शासकीय सामग्री का कोई अता-पता नहीं है।
पूरे मामले का सिलसिलेवार ब्योरा देते हुए शिकायतकर्ताओं ने बताया कि कुरसना सर्किल में जहां नया तेंदूपत्ता गोडाउन बनाया गया है, वहां पहले से मौजूद एक पुराने नाके को तोड़ा गया था। आरोप है कि उस पुराने नाके से निकली कीमती सागौन की लकड़ियां, चौखट, दरवाजे, बल्लियां और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री कहां गायब कर दी गईं, इसका कोई लिखित रिकॉर्ड विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। इसी तरह, गवासेन परिक्षेत्र भवन के बाजू में स्थित कुटीर भवन को तोड़कर तेंदूपत्ता समिति भवन का निर्माण कराया गया, लेकिन तोड़े गए भवन से निकली चौखट, खिड़कियां और अन्य सामग्री किस जगह रखी गई हैं, इस पर भी विभागीय जिम्मेदार खामोश हैं।
अजई जोड़ पर स्थित वन नाके का नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) द्वारा अधिग्रहण किया गया था। आरोप है कि इस अधिग्रहण के दौरान नाके में लगी लोहे की सामग्री, चौखट और खिड़कियों को गायब कर दिया गया और इसके निपटान से जुड़ा कोई भी आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया। इतना ही नहीं, अजई में बनाए गए नए नाके में फर्जीवाड़े की हद पार करते हुए पुराने नाके की ही चौखट लगा दी गई, जबकि कागजों पर फर्जी बिल लगाकर नई चौखट खरीदना दिखाकर सरकारी धन का खुलेआम दुरुपयोग किया गया है।
वित्तीय गबन का एक और चौंकाने वाला मामला पानी की खपत को लेकर सामने आया है। आरोप है कि अजई नाके के निर्माण कार्य के दौरान सरकारी वाहन और सरकारी टैंकर से पानी का उपयोग किया गया, लेकिन फर्जी भुगतान के लिए कागजों पर प्राइवेट पानी टैंकरों के बिल लगा दिए गए। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनके पास इस पूरे फर्जीवाड़े के स्पष्ट फोटो और वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं। इन तमाम गंभीर शिकायतों के बावजूद, जब मीडिया ने इस संबंध में सीसीएफ और डीएफओ से संपर्क करने का प्रयास किया, तो उन्होंने फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या उच्चाधिकारी निचले अमले को संरक्षण दे रहे हैं?
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बैतूल वन मंडल में सामने आए इस बहुचर्चित मामले में अब प्रशासनिक हलकों से लेकर स्थानीय नागरिकों तक में भारी आक्रोश व्याप्त है। सरकारी संपत्ति के गबन और फर्जी बिलिंग के इस पूरे खेल पर निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है। अब सभी की निगाहें राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) पर टिकी हैं कि वे इस मामले में क्या कड़ा संज्ञान लेते हैं और दोषी कर्मचारियों व उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।