नई दिल्ली। Nishaanebaz.com-Reshma Nilofer Journey: भारत के कुछ सबसे चुनौतीपूर्ण जलमार्गों पर नौकायन करने वाली पहली महिला बनना किसी के लिए भी आसान नहीं था। रेशमा नीलोफर विशालाक्षी के लिए यह सफर साहस, अनुशासन और उस क्षेत्र में प्रवेश करने के अटूट दृढ़ संकल्प से भरी यात्रा रही है, जहां महिलाओं की उपस्थिति लगभग न के बराबर थी। वर्षों के कठोर प्रशिक्षण के बाद उन्होंने भारत की पहली महिला समुद्री पायलट बनकर पुरुष प्रधान समुद्री पेशे की तमाम बाधाओं को तोड़ दिया है।
2018 में रचा इतिहास, हुगली नदी पर संभाली कमान
रेशमा नीलोफर का यह सफर साल 2011 में शुरू हुआ था, जब उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी कोलकाता बंदरगाह में पायलट प्रशिक्षु के रूप में कदम रखा था। कई वर्षों के गहन प्रशिक्षण, नौकायन के अनुभव और कठिन परीक्षाएं उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने 2018 में समुद्री पायलट के रूप में आधिकारिक योग्यता प्राप्त की।
इस उपलब्धि के साथ ही उन्होंने हुगली नदी पर जहाजों का संचालन शुरू किया, जो भारत के सबसे कठिन नौवहन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह नदी तेज ज्वार, बदलती रेत की पट्टियों और संकरे चैनलों के लिए कुख्यात है, जहां जहाजों को पार कराना बहुत बड़ा जोखिम माना जाता है।
Read More : CG News: भिलाई- हरिराज होटल के बाथरूम में स्पाइ कैमरा! स्टाफ पर शक, घटना के बाद से फरार
साधारण परिवार से लेकर एक असाधारण करियर तक
चेन्नई के एक छोटे से 600 वर्ग फुट के सरकारी क्वार्टर में पली-बढ़ी रेशमा के शुरुआती जीवन का समुद्री जगत से कोई सीधा नाता नहीं था। उनके माता-पिता केंद्र सरकार के कर्मचारी थे। उनका जीवन तब बदला जब उन्होंने एक शिपिंग कंपनी के दोहरी योग्यता कार्यक्रम के बारे में अखबार में विज्ञापन देखा। लगभग 4,000 आवेदकों में से केवल 300 उम्मीदवारों को इस पांच वर्षीय प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुना गया था।
उन्होंने एएमईटी (AMET) विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण प्राप्त किया, जहां उनके बैच में केवल 5 महिलाएं थीं, जबकि उनके साथ लगभग 5,000 पुरुष छात्र अध्ययन कर रहे थे। यह आंकड़े इस क्षेत्र में मौजूद भारी लैंगिक अंतर को स्पष्ट करते हैं। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने विभिन्न देशों के अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर दो साल तक नौकायन किया और कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट में शामिल होने से पहले आईसीजीएस राजकिरण पर अपनी सेवाएं दीं।
‘नारी शक्ति पुरस्कार 2018’ से नवाजा जा चुका है
अपने इस चुनौतीपूर्ण करियर के दौरान उन्हें कई बार लोगों के संदेह और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इस क्षेत्र में गिने-चुने महिलाओं में से एक होने का अकेलापन और “क्या वे पुरुषों की तरह काम कर सकती हैं?” जैसे सवालों ने उनकी मुश्किलें बढ़ाईं, लेकिन उन्होंने इन सबका जवाब अपने काम और दृढ़ संकल्प से दिया।
उनकी इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘नारी शक्ति पुरस्कार 2018’ से सम्मानित किया गया। रेशमा की यह कहानी आज उन लाखों युवतियों के लिए एक मिसाल है जो उन क्षेत्रों में अपनी जगह बनाना चाहती हैं जिनका नक्शा कभी उनके लिए नहीं बनाया गया था।






