धर्म: हिंदू पंचांग में किसी व्रत या त्योहार की तारीख तय करना केवल तिथि का नाम देखने भर का काम नहीं है। एक ही तिथि अगर दो अलग-अलग दिनों पड़ रही हो, तो यह देखना जरूरी होता है कि वह तिथि सूर्योदय, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न, प्रदोष या रात में किस समय मौजूद है। इसके अलावा अलग-अलग व्रतों के लिए शास्त्रों में निर्धारित विशेष नियम भी देखे जाते हैं।
प्रतिपदा से चतुर्थी तक क्या है नियम?
प्रतिपदा के मामले में शुक्ल पक्ष में मध्याह्न के बाद तक रहने वाली तिथि को महत्व दिया जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष में पूर्वाह्न में व्याप्त प्रतिपदा को प्राथमिकता दी जाती है।
द्वितीया को लेकर हेमाद्रि और माधवाचार्य के मतों में अंतर मिलता है। हेमाद्रि के अनुसार कृष्ण पक्ष में पूर्वाह्न वाली और शुक्ल पक्ष में पराह्न वाली द्वितीया ली जाती है, जबकि माधवाचार्य परवर्ती तिथि को प्रमुख मानते हैं।
तृतीया में दोनों पक्षों के लिए मध्याह्नोत्तर काल तक रहने वाली तिथि का विचार किया जाता है। दो दिन तृतीया पड़ने पर सामान्यतः बाद वाली तिथि को लिया जाता है, लेकिन गौरी व्रत के लिए परवर्ती तृतीया का विशेष विधान है।
चतुर्थी में भी व्रत के अनुसार नियम बदल सकते हैं। गणेश व्रत के लिए चंद्रोदय के समय व्याप्त चतुर्थी को विशेष महत्व दिया गया है।
पंचमी से नवमी तक तिथि चयन
पंचमी को लेकर अलग-अलग आचार्यों के मत मिलते हैं। माधवाचार्य दोनों पक्षों में पूर्ववर्ती पंचमी को मानते हैं, जबकि हेमाद्रि कृष्ण पक्ष में पूर्ववर्ती और शुक्ल पक्ष में परवर्ती पंचमी बताते हैं।
षष्ठी में स्कंद षष्ठी के लिए पहले दिन की तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि अन्य व्रतों में बाद वाली षष्ठी का विधान बताया गया है।
सप्तमी के लिए पूर्वाह्नव्यापिनी तिथि को प्रमुख माना गया है।
अष्टमी में भी व्रत के अनुसार नियम अलग हैं। जन्माष्टमी के लिए विशेष निर्णय होता है, जबकि सामान्य नियमों में पूर्ववर्ती या परवर्ती अष्टमी ली जाती है।
नवमी के लिए दोनों पक्षों में पूर्ववर्ती तिथि ग्रहण करने का विधान बताया गया है।
दशमी से अमावस्या तक कैसे तय होती है तारीख?
दशमी को लेकर हेमाद्रि, माधवाचार्य और कमलाकर भट्ट के मत अलग-अलग हैं। वहीं सूर्योदय के समय व्याप्त दशमी को विशेष महत्व दिया गया है।
एकादशी के लिए अलग और विस्तृत शास्त्रीय नियमों का पालन किया जाता है। द्वादशी में दोनों पक्षों के लिए पूर्ववर्ती तिथि ग्रहण करने का विधान है।
त्रयोदशी और चतुर्दशी में भी पक्ष तथा व्रत के अनुसार तिथि बदल सकती है। शिवरात्रि के लिए रात में व्याप्त चतुर्दशी को विशेष महत्व दिया जाता है।
पूर्णिमा और अमावस्या के मामले में व्रत, दान या पितृकार्य किस समय किया जाना है, उसके अनुसार तिथि का चयन होता है। अपराह्न में व्याप्त तिथि को प्राथमिकता दी जाती है और तिथि क्षय होने पर पूर्ववर्ती तिथि ग्रहण करने का विधान बताया गया है।






