Massive Action in Bilaspur: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सामने आए ₹17.24 करोड़ रुपये के बहुचर्चित सर्पदंश (सांप काटने से मौत) मुआवजा घोटाले की जांच में नित नए और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में सिम्स (CIMS) की तत्कालीन महिला डॉक्टर की जेल रवानगी के बाद, अब पुलिस ने राजस्व विभाग के बड़े चेहरों पर शिकंजा कसा है।
रविवार (19 जुलाई 2026) को सरकंडा और तोरवा पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए बिलासपुर एसडीएम कार्यालय के दो बाबुओं और तहसील कार्यालय के एक क्लर्क को गिरफ्तार कर लिया है। इन कर्मचारियों पर अपनी सरकारी लॉगिन आईडी का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने और घोटाले को अंजाम देने का गंभीर आरोप है।
विधानसभा में उठा था मुद्दा, दर्ज हो चुकी हैं 14 FIR
यह पूरा महाघोटाला तब सुर्खियों में आया जब बिलासपुर की बेलतरा सीट से भाजपा विधायक सुशांत शुक्ला ने इस गंभीर विषय को विधानसभा सत्र के दौरान सदन में पूरी ताकत से उठाया था। इसके बाद शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए बिलासपुर एसएसपी रजनेश सिंह स्वयं इस पूरी उच्चस्तरीय जांच की निगरानी कर रहे हैं। घोटाले की कड़ियों को जोड़ते हुए पुलिस अब तक अलग-अलग थानों में कुल 14 एफआईआर (FIR) दर्ज कर चुकी है।
लॉगिन आईडी का खेल और डॉक्टर की भूमिका
पुलिस जांच के अनुसार, सरकंडा थाना पुलिस ने एसडीएम कार्यालय में पदस्थ बाबू नरेंद्र कौशिक और गरीब राम बिंझवार सहित तहसील कार्यालय के क्लर्क हरिशंकर राठौर को गिरफ्तार किया है। इन तीनों पर आरोप है कि इन्होंने मोटी रकम लेकर फाइलों में फर्जी सर्पदंश प्रकरण दर्ज किए और अपनी आधिकारिक लॉगिन आईडी से अप्रूवल देकर मुआवजा राशि स्वीकृत कराने का रास्ता साफ किया।
इससे पहले, तोरवा पुलिस ने बिलासपुर सिम्स (CIMS) अस्पताल की तत्कालीन डॉक्टर प्रियंका सोनी को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। डॉक्टर प्रियंका पर आरोप है कि उन्होंने बिना शव परीक्षण किए या सामान्य मौतों को भी पैसों के लालच में ‘सर्पदंश से हुई मौत’ बताते हुए फर्जी पोस्टमार्टम (PM) रिपोर्ट जारी कर दी थी।
संगठित गिरोह की तरह चल रहा था काम, कई और डॉक्टर रडार पर
जांच एजेंसियों के मुताबिक, बिलासपुर में यह कोई छिटपुट भ्रष्टाचार नहीं बल्कि एक पूरा संगठित गिरोह था जो पिछले 5 वर्षों से सक्रिय था। इस गिरोह में सरकारी मुलाजिमों के साथ-साथ दलाल और वकील भी शामिल थे। पुलिस इस मामले में तहसील कार्यालय से जुड़े ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा (जिसे नेटवर्क का मुख्य संचालक माना जा रहा है) और एक अधिवक्ता रंजीत चतुर्वेदी को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है, जबकि मुख्य मास्टरमाइंड वकील श्रवण वस्त्रकार फिलहाल फरार चल रहा है।
जांच का अगला चरण:
एसएसपी रजनेश सिंह के निर्देशानुसार पुलिस की टीम पिछले पांच साल में सर्पदंश से हुई मौत के करीब 15 संदिग्ध मामलों को री-ओपन कर चुकी है। इन फाइलों पर साइन करने वाले और फर्जी रिपोर्ट देने वाले बिलासपुर व आसपास के कई अन्य सरकारी डॉक्टरों से भी पुलिस की कड़ी पूछताछ जारी है। माना जा रहा है कि आने वाले 24 से 48 घंटों के भीतर कुछ और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों और नामचीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी हो सकती है।







