Rewa Free Hearse Service: रीवा। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जरूरतमंद परिवारों को निःशुल्क शव वाहन उपलब्ध कराने की योजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। रीवा के संभागीय संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) में सामने आए एक मामले ने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर उजागर कर दिया है। अस्पताल परिसर में चार शव वाहन उपलब्ध होने के बावजूद एक मृतका के परिजनों को शव घर ले जाने के लिए करीब छह घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इस घटना ने न केवल अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रदेशभर में संचालित निःशुल्क शव वाहन सेवा की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
प्रदेश सरकार ने मानवता के दृष्टिकोण से यह योजना शुरू की थी ताकि किसी भी परिवार को अपने प्रियजन के निधन के बाद शव को घर ले जाने के लिए आर्थिक या व्यवस्थागत परेशानियों का सामना न करना पड़े। लेकिन रीवा में सामने आई घटना ने इस योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
चार शव वाहन, लेकिन संचालन के लिए केवल दो चालक
Rewa Free Hearse Service: जानकारी के अनुसार, प्रदेश में निःशुल्क शव वाहन सेवा का संचालन एक निजी एजेंसी के माध्यम से किया जा रहा है। रीवा के संजय गांधी अस्पताल में कंपनी ने चार शव वाहन तो उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए केवल दो चालकों की ही तैनाती की गई है। ऐसे में यदि एक समय में एक से अधिक शव वाहन की आवश्यकता पड़ती है तो परिजनों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।बताया जा रहा है कि कई बार अस्पताल प्रशासन को भी यह जानकारी नहीं होती कि वाहन किस स्थान पर है और चालक कब उपलब्ध होगा। इतना ही नहीं, कंपनी के जिला समन्वयक (डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर) से लेकर भोपाल स्थित वरिष्ठ अधिकारियों तक के पास भी कई बार वाहनों की वास्तविक स्थिति की स्पष्ट जानकारी नहीं रहती।
संदिग्ध मौत के बाद सामने आई अव्यवस्था
Rewa Free Hearse Service: यह पूरा मामला गढ़ थाना क्षेत्र के लालगांव चौकी निवासी सविता पटेल (40 वर्ष) की मौत के बाद सामने आया। महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने पर शव को पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल लाया गया। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजनों ने मुख्यमंत्री की निःशुल्क शव वाहन योजना के तहत वाहन उपलब्ध कराने की मांग की।
परिजनों का कहना है कि अस्पताल प्रशासन ने संबंधित कंपनी के अधिकारियों से कई बार संपर्क किया, लेकिन इसके बावजूद समय पर शव वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया। करीब छह घंटे तक इंतजार करने के बाद वाहन अस्पताल पहुंचा और तब जाकर शव को गांव के लिए रवाना किया जा सका।
“कागजों में सफल, जमीन पर फेल” होने के आरोप
Rewa Free Hearse Service: घटना के बाद परिजनों ने सरकार की योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी परिवार को अपने मृत परिजन के शव के लिए घंटों तक इंतजार करना पड़े, तो ऐसी व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उनका आरोप है कि सरकारी योजनाओं का प्रचार तो बड़े स्तर पर किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका लाभ समय पर नहीं मिल पाता।स्थानीय लोगों का भी कहना है कि अस्पताल में चार शव वाहन खड़े होने के बावजूद यदि जरूरत के समय वाहन उपलब्ध नहीं हो रहा है, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है।
सरकारी आंकड़ों और वास्तविक स्थिति में अंतर
Rewa Free Hearse Service: इस मामले के बाद उन सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि रीवा के संजय गांधी अस्पताल से प्रदेश में सबसे अधिक शव निःशुल्क सेवा के माध्यम से उनके गंतव्य तक पहुंचाए गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सेवा इतनी प्रभावी होती, तो परिजनों को घंटों तक शव वाहन का इंतजार नहीं करना पड़ता।लोगों का मानना है कि केवल आंकड़ों के आधार पर योजना की सफलता का दावा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जरूरत इस बात की है कि सेवा वास्तविक समय पर लोगों को उपलब्ध हो।
अस्पताल प्रबंधन ने स्वीकार की समन्वय की समस्या
Rewa Free Hearse Service: मामले पर संजय गांधी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा ने कहा कि अस्पताल प्रशासन लगातार संबंधित कंपनी के संपर्क में है। उन्होंने माना कि वर्तमान में कंपनी और अस्पताल के बीच समन्वय की कुछ समस्याएं हैं, जिनके कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई। उन्होंने भरोसा दिलाया कि कंपनी को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं और जल्द ही अतिरिक्त चालकों की व्यवस्था कर इस समस्या का स्थायी समाधान किया जाएगा।
व्यवस्था सुधारने की मांग तेज
Rewa Free Hearse Service: घटना सामने आने के बाद सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि शव वाहन सेवा का संचालन अधिक प्रभावी बनाया जाए। लोगों का कहना है कि अस्पतालों में उपलब्ध वाहनों के अनुसार पर्याप्त संख्या में चालकों की नियुक्ति की जाए, ताकि किसी भी शोकाकुल परिवार को अपने प्रियजन के अंतिम सफर के लिए घंटों तक इंतजार न करना पड़े।अब सभी की नजर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर है कि जांच के बाद इस मामले में क्या कदम उठाए जाते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या व्यवस्था की जाती है।







