Monday, September 28, 2026
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Disability Quota Fraud: बीईओ दफ्तर के विरोधाभासी आरटीआई जवाबों से हड़कंप, राज्य सूचना आयोग में अपील की तैयारी

Disability Quota Fraud: गौरी शंकर गुप्ता/घरघोड़ा (रायगढ़)। रायगढ़ जिले के विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय घरघोड़ा से सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत प्राप्त हुए आधिकारिक दस्तावेजों ने दिव्यांग कोटे से हुई नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि करीब दो वर्ष पहले इसी संवेदनशील विषय पर विभाग ने 11 दिव्यांग कर्मचारियों की सूची उपलब्ध कराई थी, जबकि अब उसी विषय पर केवल 6 कर्मचारियों की सूची दी गई है। दोनों सूचियों में भारी विरोधाभास और अंतर सामने आने से सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता और विभागीय कार्यप्रणाली पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गई है।

दो साल में 11 से 6 कैसे हो गई सूची? उठ रहे गंभीर प्रश्न

पूर्व में प्राप्त आरटीआई उत्तर में दिव्यांग कोटे से नियुक्त 11 अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम दर्ज थे, जबकि नवीन आरटीआई जवाब में केवल 6 कर्मचारियों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बाकी 5 कर्मचारियों के नाम आखिर वर्तमान सूची से क्यों और किस आधार पर हटाए गए? दोनों आरटीआई उत्तरों की तुलना करने पर कई गंभीर प्रश्न सामने आते हैं— क्या विभाग ने पहले गलत जानकारी दी थी? यदि पहली सूची सही थी, तो वर्तमान सूची से 5 नाम क्यों गायब हैं? क्या संबंधित कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए, पदोन्नत हुए या उनका स्थानांतरण हुआ? यदि हां, तो उसका आधिकारिक आदेश कहां है? या फिर वर्तमान आरटीआई में जानबूझकर अधूरी जानकारी देकर किसी बड़े सच को छिपाया जा रहा है?

सबसे अहम दस्तावेज ‘दिव्यांग प्रमाण-पत्र’ देने से विभाग का परहेज

महीनों पूर्व लगाए गए आरटीआई आवेदन में स्पष्ट रूप से नियुक्ति के समय प्रस्तुत दिव्यांग प्रमाण-पत्र की प्रमाणित प्रति मांगी गई थी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति वैध दिव्यांग प्रमाण-पत्र के आधार पर हुई थी या नहीं। लेकिन विभाग ने इस महत्वपूर्ण दस्तावेज की प्रतिलिपि उपलब्ध कराने के बजाय केवल नामों की अधूरी सूची भेज दी। इससे संदेह और गहरा गया है कि क्या विभाग के पास नियुक्ति के समय जमा दिव्यांग प्रमाण-पत्र उपलब्ध नहीं हैं? यदि उपलब्ध हैं तो उनकी प्रमाणित प्रति देने से जनसूचना अधिकारी परहेज क्यों कर रहे हैं?

आरटीआई कानून के उल्लंघन पर धारा 20 के तहत कार्रवाई का प्रावधान

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार जनसूचना अधिकारी की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह आवेदक को पूर्ण, सही एवं अभिलेख आधारित सूचना उपलब्ध कराए। यदि बिना किसी वैधानिक कारण के सूचना रोकी जाती है या भ्रामक अथवा अधूरी जानकारी दी जाती है, तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध आरटीआई कानून की धारा 20 के तहत दंडात्मक कार्रवाई और जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्त, स्थानांतरण या सेवानिवृत्ति हुई है, तो उसका भी रिकॉर्ड विभाग के पास होना चाहिए और आरटीआई में उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था।

दिव्यांग कोटे में फर्जीवाड़े की आशंका, स्वतंत्र जांच की मांग तेज

विरोधाभासी सूचियों और मूल दिव्यांग प्रमाण-पत्रों की प्रतियां उपलब्ध नहीं कराए जाने के बाद क्षेत्र में नियुक्तियों में बड़े फर्जीवाड़े की आशंकाओं को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सजग नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच की मांग की जा रही है। मुख्य रूप से यह मांग उठ रही है कि वर्ष 2024 और वर्तमान आरटीआई में दी गई दोनों सूचियों का मिलान कराया जाए, गायब 5 कर्मचारियों के संबंध में अभिलेख आधारित कारण सार्वजनिक किए जाएं और नियुक्ति के समय प्रस्तुत सभी दिव्यांग प्रमाण-पत्रों का मेडिकल बोर्ड से भौतिक सत्यापन कराया जाए।

प्रथम अपील और राज्य सूचना आयोग जाने की तैयारी

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले को लेकर पीड़ित पक्ष द्वारा प्रथम अपील और राज्य सूचना आयोग (SIC) में शिकायत दर्ज कराने की तैयारी की जा रही है। यदि सक्षम जांच में रिकॉर्ड में हेरफेर, सूचना छिपाने या नियुक्तियों में कोई बड़ी अनियमितता सामने आती है, तो यह मामला केवल आरटीआई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दिव्यांग आरक्षण के दुरुपयोग और संभावित बड़े फर्जीवाड़े के रूप में आपराधिक दायरे में आ सकता है।

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