Saturday, August 22, 2026
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Biodiversity Day2026: अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर बस्तर को मिली वैश्विक पहचान,बैलाडीला की पहाड़ियों में मिला ‘जंगली अरहर’ का दुर्लभ खजाना

दंतेवाड़ा। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से एक बेहद सुखद और बड़ी खबर सामने आई है। जिले की प्रसिद्ध बैलाडीला पहाड़ियों में किए गए एक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों को ‘जंगली अरहर’ की एक अत्यंत दुर्लभ प्रजाति मिली है। इस अनोखी प्रजाति को कजानस कजानिफोलियस नाम से जाना जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह आज के दौर में खेती की जाने वाली अरहर की मूल ‘जंगली पूर्वज’ प्रजाति है। इसके साथ ही, इसमें भविष्य की कठिन जलवायु चुनौतियों से डटकर मुकाबला करने की अद्भुत क्षमता छिपी हुई है।

दुर्लभ आनुवंशिक गुणों से भरपूर है यह प्रजाति

वैज्ञानिकों के अनुसार, बैलाडीला में मिली इस जंगली अरहर की प्रजाति में गजब की रोग प्रतिरोधक क्षमता मौजूद है। इसके विपरीत, यह अत्यधिक गर्मी और सूखे के प्रभाव को भी आसानी से सहन करने की ताकत रखती है। यही कारण है कि इसे भविष्य की वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कृषि अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके अलावा, इस प्रजाति में उच्च प्रोटीन जैसे दुर्लभ आनुवंशिक गुण भी पाए गए हैं। यह खोज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) रायपुर और नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेस (एनबीपीजीआर) की संयुक्त वैज्ञानिक टीम ने की है।

छत्तीसगढ़ सिर्फ धान का कटोरा नहीं, बल्कि अनूठा जीन बैंक

इस बड़ी खोज ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ केवल ‘धान का कटोरा’ नहीं है, बल्कि यह कृषि जैव विविधता का एक विशाल जीन बैंक भी है। वर्तमान में राज्य में धान की 23 हजार 250 से अधिक पारंपरिक किस्में पूरी तरह सुरक्षित हैं, जो कि पूरे एशिया महाद्वीप में सबसे बड़े संग्रहों में से एक हैं। इसके अलावा भारत सरकार के ‘पौध किस्म संरक्षण एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण’ द्वारा राज्य की 600 से अधिक कृषक प्रजातियों का आधिकारिक पंजीकरण भी किया जा चुका है।

नई मजबूत फसलें विकसित करने में मिलेगी मदद

इस विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि बैलाडीला की वादियों में मौजूद जंगली अरहर की फलियां काफी छोटी हैं। इसके साथ ही, इसके बीज गहरे काले रंग के हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यही आनुवंशिक विविधता भविष्य में ऐसी नई फसल किस्में विकसित करने में मील का पत्थर साबित होगी, जो सूखा, भीषण गर्मी और फसलों में लगने वाली बीमारियों के प्रति अधिक मजबूत होंगी। इसके साथ ही, इस अध्ययन के दौरान पूरे बैलाडीला क्षेत्र में कई दुर्लभ औषधीय पौधों, वनस्पतियों और वन्यजीवों की उल्लेखनीय उपस्थिति भी दर्ज की गई है।

विरासत स्थल घोषित करने की उठी मांग

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए एक बड़ी मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि बैलाडीला क्षेत्र में लगातार बढ़ रही खनन गतिविधियां इन दुर्लभ प्रजातियों के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। यही कारण है कि इस पूरी प्रजाति को हमेशा के लिए सुरक्षित करने के लिए बैलाडीला, किरंदुल और बचेली के पहाड़ी क्षेत्रों को तुरंत ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ घोषित किया जाना चाहिए। अंततः, इस महत्वपूर्ण सर्वेक्षण कार्य में एनएमडीसी के बचेली कॉम्प्लेक्स के पर्यावरण विभाग ने भी अपना पूरा तकनीकी सहयोग प्रदान किया है।

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