अयोध्या। भक्ति और भव्यता का मिलन जहां होता है, वहीं विराजते हैं प्रभु श्री रामलला। रामजन्मभूमि मंदिर परिसर में विराजमान बाल स्वरूप रामलला का दैनिक श्रृंगार इतना दिव्य होता है कि हर भक्त को प्रतीत होता है जैसे स्वयं त्रेता युग उनके सामने उतर आया हो।
सुबह की पहली किरण के साथ जैसे ही मंदिर के पट खुलते हैं, मंगल आरती के साथ रामलला का जागरण होता है। यह नज़ारा मानो ब्रह्मांड की शुरुआत जैसा होता है। इसके बाद होता है श्रृंगार – जिसमें उन्हें मौसम और अवसर के अनुसार विशेष वस्त्र, आभूषण, और फूलों से बनी मालाएं पहनाई जाती हैं। ये मालाएं खासतौर पर दिल्ली से मंगाई जाती हैं, जिनकी सुगंध से मंदिर परिसर महक उठता है।
गर्मियों में सूती वस्त्रों की ठंडक और सर्दियों में ऊनी स्वेटरों की गर्माहट – यह दिखाता है कि आराध्य भी भक्तों की तरह ही प्रकृति के स्पर्श को महसूस करते हैं।
दोपहर की भोग आरती और संध्या आरती के बाद, जब रात के सन्नाटे में मंदिर परिसर शांत होता है, तब रात्रि 8:30 बजे प्रभु को शयन कराया जाता है, मानो माता कौशल्या स्वयं लोरी सुना रही हों।
रामलला के दर्शन सुबह 6.30 से शाम 7.30 बजे तक ही सीमित होते हैं, लेकिन जो भी आता है, उसकी आंखों में भक्ति और मन में तृप्ति लिए ही लौटता है।
अयोध्या में रामलला के श्रृंगार को देखना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन में दिव्यता का सीधा अनुभव है।











