Friday, August 21, 2026
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Mojo-Mushroom Factory : खरोरा मोजो मशरूम फैक्ट्री में बाल श्रमिकों का शोषण! बीते 29 दिन, अब तक चुप क्यों पुलिस-सरकार ?

mojo mushroom
खरोरा मोजो मशरूम फैक्ट्री

रायपुर : रायपुर के खरोरा स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री में बाल श्रमिकों के शोषण की सनसनीखेज घटना को 28 दिन बीत चुके हैं। 17 नवंबर को 109 बच्चों को रेस्क्यू किया गया था, जिसमें 68 लड़कियां और 41 लड़के शामिल थे। रेस्क्यू के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हो पाई और दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई शुरू नहीं हुई। यह Raises सवाल उठाता है कि क्या सरकार इस गंभीर मामले में लापरवाही कर रही है?

रेस्क्यू टीम के बयान क्यों नहीं दर्ज?
Mojo-Mushroom Factory पुलिस का कहना है कि रेस्क्यू करने वाले एनजीओ और जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक अपने बयान दर्ज नहीं कराए। जबकि एनजीओ का दावा है कि उन्होंने 17 दिसंबर को दस्तावेज थाने में जमा कर दिए थे। क्या यह विलंब बच्चों की सुरक्षा और न्याय को प्रभावित कर रहा है?

   

AVA की शिकायत

AVA (एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन) ने खरोरा मोजो मशरूम फैक्ट्री में बाल श्रमिकों से बलपूर्वक काम कराने के आरोप में कई व्यक्तियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में अशोक, सुदामा, नोहर, विकास, चंदन, अभी, वंशी और बुद्धदेव सहित अन्य का नाम शामिल किया गया है।राज्य संयोजक ने मोनिका खेतान, विमल खेतान और विश्वप्रताप सिंह राणा को फर्म का संचालक बताया है।

इस शिकायत की कॉपी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो, रायपुर कलेक्टर गौरव कुमार सिंह, रायपुर एसएसपी डॉ. लाल उम्मेद सिंह, महिला एवं बाल विकास विभाग रायपुर की जिला अधिकारी और एवीए नई दिल्ली के निदेशक मनीष शर्मा को भी सौंप दी गई है।

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बच्चों की कथित यातना और खतरनाक केमिकल का खुलासा
रेस्क्यू किए गए बच्चों ने बताया कि एक कमरे में 10–15 बच्चों को रखा जाता था। उन्हें सुबह 4-5 बजे उठाकर देर रात तक काम करवाया जाता था। खाना केवल दो वक्त दिया जाता था। फैक्ट्री में बच्चों को फॉर्मोलीन जैसी जहरीली केमिकल के संपर्क में रखा गया, जिससे गंभीर बीमारियों का खतरा था। क्या प्रशासन ने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकामी दिखाई?

मोजो मशरूम फैक्ट्री का पर्दाफाश
Mojo-Mushroom Factory असल में मोजो मशरूम का नाम मारूति फ्रेश फर्म है। यह खरोरा इलाके में उमा श्री राइस मिल परिसर में संचालित है। श्रम विभाग के अनुसार राण विश्व प्रताप सिंह इसका पार्टनर है और राजेंद्र तिवारी इसका लीगल एडवाइजर है। क्या अधिकारियों की संलिप्तता या अनदेखी इस मामले को लंबित रख रही है?

पुलिस की स्थिति और सवाल
रायपुर के नगर पुलिस अधीक्षक (सीएसपी) वीरेंद्र चतुर्वेदी का कहना है कि सभी दस्तावेज और बयानों की जांच की जा रही है और नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि 28 दिन में इतनी गंभीर घटना के बावजूद एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई?

‘निशानेबाज़’ न्यूज ने सबसे पहले उठाया पर्दा
जानकारी दें कि, ‘निशानेबाज़’ न्यूज ने इस मामले में सबसे पहले रिपोर्ट प्रकाशित कर पूरे मामले को उजागर किया। वहीं अब यह सवाल भी उठता है कि क्या बाल श्रमिकों के शोषण जैसे गंभीर मामलों में सरकारी तंत्र की धीमी प्रतिक्रिया चिंता का विषय नहीं है?

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