Thursday, August 20, 2026
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Bilaspur CNI Church Case: बिलासपुर में ईसाई परिवार का हुक्का-पानी बंद करने वाले 7 पदाधिकारियों पर मुकदमा, जेएमएफसी कोर्ट का निर्देश

Bilaspur CNI Church Case: बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के अंतर्गत आने वाले कोटा क्षेत्र से सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों के हनन से जुड़ी एक बेहद गंभीर और विसंगतिपूर्ण घटना सामने आई है। कोटा स्थित सीएनआई (चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया) चर्च की नई समिति के सात रसूखदार पदाधिकारियों के खिलाफ एक स्थानीय ईसाई परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने, उनका हुक्का-पानी बंद करने और उन्हें भीषण मानसिक प्रताड़ना देने के गंभीर आरोपों में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया है। यह बड़ी विधिक कार्रवाई कोटा पुलिस द्वारा शुरू में ढिलाई बरतने के बाद, माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) दीप्ति बरवा की अदालत के कड़े रुख और सीधे विधिक आदेश के बाद अमल में लाई गई है।

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2 साल से चल रहा था प्रताड़ना का खेल, सोशल मीडिया पर बहिष्कार की अपील

प्राप्त आधिकारिक विधिक जानकारी के अनुसार, यह पूरा संवेदनशील प्रकरण मिशन कंपाउंड कोटा निवासी पीड़ित हरीश लाल की लिखित शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने अदालत को बताया कि नई चर्च समिति के गठन के बाद से पिछले लगभग दो वर्षों से उन्हें और उनके पूरे परिवार को चर्च की सभी धार्मिक व सामाजिक गतिविधियों से विसंगतिपूर्ण रूप से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया था।

हद तो तब हो गई जब आरोपियों ने डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया का दुरुपयोग करते हुए पूरे मसीही समुदाय के लोगों से सार्वजनिक अपील की कि वे हरीश लाल के परिवार से किसी भी प्रकार का सामाजिक या पारिवारिक संबंध न रखें और उनके सुख-दुख में शामिल न हों। इसके अलावा, 17 जनवरी को चर्च परिसर में एक एकतरफा बैठक आयोजित कर पीड़ित पर क्रिसमस और ईस्टर जैसे पवित्र धार्मिक पर्वों का अपमान करने का मनगढ़ंत आरोप मढ़ा गया और बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के उन्हें “नॉट इन गुड स्टैंडिंग” घोषित कर समाज से बहिष्कृत कर दिया गया।

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रायपुर डायोसिस के बिशप के आदेश को भी ठुकराया

पीड़ित परिवार ने अपनी विधिक याचिका में यह भी रेखांकित किया है कि इस दंडात्मक सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ जब उन्होंने रायपुर स्थित ‘डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़’ के सर्वोच्च बिशप के समक्ष गुहार लगाई, तो बिशप कार्यालय ने इस बहिष्कार को पूरी तरह से अवैध, अमानवीय और असंवैधानिक बताते हुए एक आधिकारिक विधिक स्पष्टीकरण व निर्देश जारी किया था। बिशप ने कोटा चर्च समिति को इस विसंगतिपूर्ण आदेश को तुरंत वापस लेने को कहा था, लेकिन आरोपियों ने अपने पद के अहंकार में बिशप के आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया और अपने तानाशाही निर्णय को ही अंतिम बताया। इसके अतिरिक्त, पीड़ित के जीवनयापन को प्रभावित करने के लिए उनके कार गैराज के मुख्य द्वार पर भी अवैध रूप से ताला जड़ दिया गया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक क्षति हुई।

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पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा, कड़े विधिक प्रावधानों के तहत जांच शुरू

अदालत के कड़े दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए कोटा थाना पुलिस ने 2 जुलाई को सात नामजद आरोपियों— पास्टर मनीष आर. मसीह, सौरभ पीटर्स, राजा सोलोमन दास, अनिल मसीह, थियोडोर पीटर्स, सुनीलेश पीटर्स और सुलेमान दास के खिलाफ विधिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) तथा नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम की विभिन्न गंभीर और गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) मधुलिका सिंह ने आधिकारिक मीडिया बुलेटिन में पुष्टि की है कि न्यायालय के आदेशानुसार अपराध दर्ज कर लिया गया है। पुलिस का विधिक सेल अब इस बात की तकनीकी जांच कर रहा है कि सोशल मीडिया पर किस आईपी एड्रेस से और किस आपराधिक उद्देश्य से बहिष्कार की अपील प्रसारित की गई थी। साथ ही चर्च समिति के इस एकतरफा निर्णय की विधिक वैधता की भी समीक्षा की जा रही है। इस घटना ने पूरे जिले के सामाजिक और मानवाधिकार हलकों में एक नई विधिक बहस छेड़ दी है।

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