नई दिल्ली। Nishaanebaz.com-OBC Creamy Layer Rules Confusion: केंद्र सरकार और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों के लिए क्रीमीलेयर नियमों को लेकर स्थिति लगातार पेचीदा बनी हुई है। देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 मार्च को दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के बाद यह भ्रम पैदा हो गया है कि यह नियम केवल भविष्य की नई भर्तियों पर लागू होगा या पुरानी लंबित भर्तियों पर भी। नियमों में व्याप्त इसी असमंजस के चलते नवनियुक्त आईएएस (IAS) अफसरों की ट्रेनिंग पिछले दो महीनों से अटकी हुई है। अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर नियमों को स्पष्ट करने की मांग की है।
केंद्र सरकार की याचिका पर फैसला अभी लंबित
ओबीसी क्रीमीलेयर के भ्रम को दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस संवेदनशील मामले पर जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 24 सितंबर को सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अभी तक लंबित है।
इस बीच, केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने एक आधिकारिक नोट जारी किया है। विभाग ने बताया कि सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट यह पूरी तरह साफ करे कि 11 मार्च के फैसले को कैसे और किस तारीख से लागू करना है। DoPT ने इसके लिए पिछले 14 सालों के सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों के विस्तृत आंकड़े जुटाकर इसके विभिन्न कानूनी व प्रशासनिक पहलुओं का गहन आकलन किया है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: केवल आय नहीं, पद भी देखा जाएगा
उल्लेखनीय है कि 11 मार्च 2026 को सुनाए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज करते हुए दिल्ली, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के उन फैसलों को सही ठहराया था, जिनसे दर्जनों UPSC अभ्यर्थियों को राहत मिली थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था:
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आय के साथ पद और सामाजिक स्थिति अनिवार्य: OBC आरक्षण के तहत क्रीमीलेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की वार्षिक आय (सैलरी) के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता या अभिभावकों के पद (पोस्ट) और उनकी सामाजिक स्थिति (स्टेटस) को भी ध्यान में रखा जाना अनिवार्य है।
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भेदभाव अनुचित: यदि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और प्राइवेट या पीएसयू (PSU) कर्मचारियों के बच्चों को अलग-अलग तरीके से मापकर आरक्षण दिया जाता है, तो यह संविधान के तहत अनुचित भेदभाव होगा।
क्यों पैदा हुआ संकट और क्यों रुकी ट्रेनिंग?
पूर्व में, केंद्र सरकार (DoPT) ने कई ऐसे ओबीसी अभ्यर्थियों को क्रीमीलेयर की श्रेणी में डाल दिया था, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली थी। इसके लिए सरकार ने उनके माता-पिता की वेतन आय (सैलरी) को आधार बनाया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन अभ्यर्थियों को सेवा आवंटन और नियुक्ति का रास्ता तो साफ हुआ, लेकिन पुरानी भर्ती और नई भर्ती में क्रीमीलेयर के पैमानों को लागू करने की तारीख पर संशय होने से नए बैच की IAS ट्रेनिंग प्रक्रिया ठप पड़ गई।
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अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले पर टिकी हैं, जिसके बाद ही पिछले दो महीनों से रुकी हुई प्रशासनिक अधिकारियों की ट्रेनिंग और अंतिम सेवा आवंटन की राह सुगम हो सकेगी।