नई दिल्ली। Ramlila Maidan History: पुरानी और नई दिल्ली की सरहद पर, ऐतिहासिक दिल्ली गेट और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बीच फैला रामलीला मैदान एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति का मुख्य केंद्र बना हुआ है। हाल ही में 1 नवंबर 2026 को मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के 20 से अधिक राजनीतिक दलों ने इसी ऐतिहासिक मैदान से केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग के खिलाफ शंखनाद किया है। लाखों लोगों के जुटने के ऐतिहासिक दावों और जनआंदोलनों की महान विरासत को खुद में समेटे इस मैदान का अतीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक क्रांतियों और अभूतपूर्व राजनीतिक बदलावों से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।
जिस स्थान को आज पूरी दुनिया रामलीला मैदान के नाम से जानती है, वह प्राचीन काल में ऐतिहासिक ‘इंद्रपत’ (इंद्रप्रस्थ) गांव की परिधि में आता था। उस दौर में यहाँ करीब 10 एकड़ में फैला एक विशाल प्राकृतिक तालाब हुआ करता था, जिसके चारों ओर हरे-भरे खेत लहलहाते थे। 1850 के दशक में अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने लाल किले के बाहर हिंदू-मुस्लिम एकता और सांस्कृतिक सौहार्द को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इसी स्थान पर पहली बार भव्य रामलीला मंचन की शुरुआत करवाई थी। इसके बाद पुरानी दिल्ली की विभिन्न संस्थाओं ने यहाँ नियमित रामलीला का आयोजन शुरू किया, जिससे इस खुले भूखंड का नाम ‘रामलीला मैदान’ पड़ा।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब ब्रिटिश हुकूमत ने दिल्ली का शासन अपने हाथ में लिया, तो 1883 में रामलीला मंचन पर रोक लगाकर इसे सैन्य छावनी शिविर में बदल दिया गया। कई दशकों के प्रतिबंध के बाद, वर्ष 1911 में भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय के अथक प्रयासों, सामाजिक दबाव और कानूनी पैरवी के कारण अंग्रेजों को झुकना पड़ा और यह जमीन पुनः सार्वजनिक आयोजनों के लिए मुक्त हुई। आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे शीर्ष नेताओं ने यहाँ जनसभाएं कीं। वर्ष 1945 में मुस्लिम लीग के जलसे में जब भीड़ ने मोहम्मद अली जिन्ना को ‘मौलाना’ कहा, तो वे भड़क गए और खुद को केवल राजनीतिक नेता बताया।
स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1952 में जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण और परमिट व्यवस्था के विरोध में इसी मैदान से ऐतिहासिक सत्याग्रह की शुरुआत की थी। वर्ष 1955 में मैदान की पक्की चारदीवारी और स्थायी मंच का निर्माण कराया गया। जनवरी 1961 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस फिलिप के भारत आगमन पर केंद्र सरकार ने इसी मैदान में उनका भव्य नागरिक अभिनंदन किया था।
यह मैदान देश के दो बड़े युद्धकालीन क्षणों का साक्षी भी बना। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद 27 जनवरी 1963 को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की मौजूदगी में ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत गाया था, जिससे पूरा देश भावुक हो उठा था। इसके बाद 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और अन्न संकट के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मंच से ऐतिहासिक ‘जय जवान, जय किसान’ का उद्घोष किया था।
25 जून 1975 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने इसी मैदान से ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ का नारा देकर आपातकाल से पूर्व इंदिरा गांधी सरकार की नीव हिला दी थी। आपातकाल के बाद 1977 में मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने यहीं हाथ मिलाकर ‘जनता पार्टी’ की नींव रखी और देश को पहली गैर-कांग्रेसी सरकार दी।
21वीं सदी में भी यह मैदान क्रांति का गढ़ बना रहा। 2011 में बाबा रामदेव का भ्रष्टाचार विरोधी अनशन और पुलिस लाठीचार्ज, तथा अगस्त 2011 में अन्ना हजारे का ऐतिहासिक ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ और जनलोकपाल आंदोलन इसी मैदान की देन रहे। इसी आंदोलन की कोख से निकली आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिसंबर 2013 में यहीं मुख्यमंत्री पद की पहली शपथ ली। वहीं 20 फरवरी 2025 को भाजपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का भव्य शपथ ग्रहण समारोह भी इसी मैदान में आयोजित किया गया।
अब 1 नवंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के पुनरीक्षण में कथित धांधली को लेकर उठी विपक्ष की हुंकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब भी देश में लोकतंत्र और जनअधिकारों पर बात आती है, रामलीला मैदान ही प्रतिरोध की सबसे मुखर आवाज बनता है।