निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने पद पर बने रहने या छोड़ने का निर्णय स्वयं नहीं, बल्कि संगठन के निर्देश के अनुसार ही करेंगे। संघ के शताब्दी कार्यक्रम के दौरान उन्होंने बताया कि 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर उन्होंने अपनी स्थिति संगठन को अवगत करा दी थी, लेकिन संघ ने उन्हें कार्य जारी रखने के लिए कहा।
पिछले कुछ समय से संघ नेतृत्व में संभावित बदलाव और उत्तराधिकारी को लेकर चर्चाएं तेज थीं। भागवत के इस बयान के बाद इन अटकलों पर काफी हद तक विराम लग गया है। उन्होंने कहा कि संघ में सरसंघचालक का चुनाव पारंपरिक मतदान से नहीं होता, बल्कि क्षेत्रीय और प्रांतीय जिम्मेदार पदाधिकारी मिलकर निर्णय लेते हैं।
75 वर्ष के बाद पद न रखने की परंपरा पर टिप्पणी
भागवत ने कहा कि सामान्य रूप से 75 वर्ष के बाद सक्रिय पद छोड़ने की बात कही जाती है, लेकिन संघ की परंपरा सेवा-निरंतरता की रही है। उन्होंने हल्के अंदाज़ में कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों से अंतिम क्षण तक कार्य करवाता है और इतिहास में रिटायरमेंट जैसी स्थिति कम ही देखने को मिली है।
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भाषा नीति पर संघ प्रमुख का रुख
कार्यक्रम में भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि अंग्रेज़ी संघ की कार्यभाषा नहीं बन सकती, क्योंकि संगठन भारतीय भाषाओं के माध्यम से समाज से जुड़ाव को प्राथमिकता देता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहां आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेज़ी का उपयोग किया जाता है और लोगों को इस भाषा में दक्ष होना चाहिए।
प्रचार नहीं, संस्कार पर जोर
भागवत ने कहा कि संघ का मूल उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि समाज में संस्कार निर्माण करना है। उन्होंने माना कि अत्यधिक प्रसिद्धि से अहंकार पैदा हो सकता है, इसलिए संगठन संतुलित सार्वजनिक उपस्थिति को ही उचित मानता है।
फिलहाल उनके बयान को संघ की कार्यशैली, नेतृत्व निरंतरता और सांस्कृतिक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।











