Mauganj News: नईगढ़ी उपचुनाव में परिवारवाद को मात, जनता ने चुना जमीनी नेता — कान्हा उरमालिया की जीत से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की प्रतिष्ठा पर सवाल

Sanjay Sahu
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Mauganj News: अभय मिश्रा / मऊगंज : मऊगंज की सियासत में आज एक नई लकीर खींच दी गई है। नईगढ़ी जनपद उपचुनाव के नतीजों ने न सिर्फ स्थानीय समीकरणों को बदला है, बल्कि सत्ता और संबंधों की ताकत के आगे जनता के फैसले ने लोकतंत्र की असली तस्वीर पेश की है।वार्ड क्रमांक 8 से कान्हा भाई उरमालिया की बड़ी जीत, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के दामाद के समर्थित प्रत्याशी को शिकस्त और कांग्रेस की अप्रभावी मौजूदगी — इन सबने मिलकर यह साबित कर दिया कि अब चुनाव संबंधों से नहीं, जनता से जीते जाते हैं।

Mauganj News: वहीं, तिलिया पंचायत में सोनू प्रजापति की जीत ने संकेत दे दिए हैं कि युवा नेतृत्व अब सिर्फ विकल्प नहीं, प्राथमिकता बन रहा है। नईगढ़ी जनपद पंचायत के वार्ड क्रमांक 8 का यह उपचुनाव अब सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं रहा। यह सत्ता बनाम जनता की लड़ाई बन चुका था। सीट पूर्व जनपद सदस्य स्व. अविनाश उरमालिया के निधन से रिक्त हुई थी, लेकिन उपचुनाव में जो समीकरण बने, वे बड़े सियासी संदेश छोड़ गए।

 

Mauganj News: कान्हा भाई उरमालिया ने 715 वोटों के साथ सबसे आगे रहते हुए 231 मतों से जीत हासिल की, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी प्रांजल सिंह 484 वोटों पर सिमट गए। खास बात यह रही कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम के दामाद के समर्थित प्रत्याशी — शीला यज्ञनिवास — सिर्फ 347 वोट ही जुटा सकीं।यानी जिस सीट पर राजनीतिक हैसियत, पारिवारिक प्रतिष्ठा और पार्टी समर्थन झोंका गया, वहाँ जनता ने एक जमीनी कार्यकर्ता को प्राथमिकता दी। कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव आत्ममंथन की वजह बना क्योंकि ना तो पार्टी का प्रभाव दिखा और ना ही कोई रणनीतिक पकड़।कुल 4988 मतदाताओं में से सिर्फ 2190 ने मतदान किया — यानी 43.91% मतदान। ये आंकड़े भी बता रहे हैं कि जनता अब सिर्फ चेहरों पर नहीं, काम के आधार पर फैसला कर रही है।

Mauganj News: वहीं हनुमना की तिलिया ग्राम पंचायत में सरपंच पद के लिए हुए चुनाव में सोनू प्रजापति ने 194 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। उन्हें 468 वोट मिले जबकि प्रतिद्वंदी राजकली कुंहार को 274। यहां भी नोटा को 16 वोट मिले, जो जनता की मौन असहमति का संकेत हैं। विश्लेषकों की मानें तो ये परिणाम केवल जीत-हार नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक ट्रेंड की शुरुआत हैं — जहां परिवारवाद की राजनीति पीछे और विकास और क्षेत्रीय सेवा के नाम पर जनप्रतिनिधि आगे आ रहे हैं।

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