क्या है बॉम्बे ब्लड ग्रुप, जो O ग्रुप से भी है अलग?
आमतौर पर लोग A, B, AB और O ब्लड ग्रुप के बारे में जानते हैं। लेकिन एक ऐसा ब्लड ग्रुप भी है, जिसका नाम सुनकर कई लोग हैरान रह जाते हैं। इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप या मेडिकल भाषा में ‘hh फीनोटाइप’ कहा जाता है। इसकी खास बात यह है कि यह सामान्य O ब्लड ग्रुप जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर O ग्रुप का खून भी इसके लिए सुरक्षित नहीं होता।
आखिर इतना दुर्लभ क्यों है यह ब्लड ग्रुप?
हमारे खून की लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर कुछ खास पहचान वाले तत्व होते हैं, जिन्हें एंटीजन कहा जाता है। A, B और O ब्लड ग्रुप की पहचान में H एंटीजन की अहम भूमिका होती है। बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति की लाल रक्त कोशिकाओं पर H एंटीजन मौजूद नहीं होता। इसके कारण A और B एंटीजन भी सामान्य तरीके से नहीं बन पाते।
यही वजह है कि साधारण ब्लड ग्रुप टेस्ट में यह O ग्रुप जैसा नजर आ सकता है। लेकिन अधिक विस्तृत जांच करने पर इसकी सही पहचान होती है। इसलिए ब्लड ट्रांसफ्यूजन से पहले इसकी पुष्टि करना बेहद जरूरी है।
किसने की थी बॉम्बे ब्लड ग्रुप की खोज?
इस ब्लड ग्रुप की पहचान साल 1952 में मुंबई में हुई थी। इसकी खोज डॉ. वाई. एम. भेंडे और उनकी टीम ने की थी। उस समय एक परिवार के सदस्यों के खून की जांच के दौरान यह अलग तरह का ब्लड ग्रुप सामने आया। मुंबई में इसकी पहचान होने के कारण इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप नाम दिया गया।
O नेगेटिव खून भी क्यों नहीं चढ़ाया जा सकता?
O नेगेटिव को कई बार इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाला यूनिवर्सल रेड सेल डोनर ग्रुप कहा जाता है, लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मामले में यह भी सुरक्षित विकल्प नहीं है। इसकी वजह यह है कि O ग्रुप की लाल रक्त कोशिकाओं पर भी H एंटीजन मौजूद होता है। बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति के शरीर में इसके खिलाफ एंटीबॉडी हो सकती हैं, जो दूसरे ग्रुप का खून चढ़ाने पर गंभीर प्रतिक्रिया पैदा कर सकती हैं। इसलिए ऐसे मरीजों को आमतौर पर बॉम्बे फीनोटाइप वाले डोनर का ही खून दिया जाता है।
क्या इस ब्लड ग्रुप वाले लोग बीमार रहते हैं?
बॉम्बे ब्लड ग्रुप होना कोई बीमारी नहीं है। इस ग्रुप वाले लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं और सिर्फ ब्लड ग्रुप अलग होने की वजह से उन्हें रोजमर्रा की सेहत से जुड़ी परेशानी नहीं होती। मुश्किल तब आती है, जब सर्जरी, दुर्घटना या किसी बीमारी के कारण खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सही डोनर ढूंढना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए इस ब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए अपनी ब्लड ग्रुप रिपोर्ट संभालकर रखना और जरूरत पड़ने पर अस्पताल को इसकी जानकारी देना जरूरी है।