Sunday, August 30, 2026
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Chhattisgarh BJP Leaders: रमन सरकार के दिग्गज चेहरों का बदला सियासी ग्राफ, कोई सांसद तो कोई सत्ता से बाहर; जानिए 2026 में कहां खड़े हैं पुराने BJP नेता

Chhattisgarh BJP Leaders
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Chhattisgarh BJP Leaders: रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक समय ऐसा था, जब बीजेपी की सरकार और संगठन की पहचान डॉ. रमन सिंह के साथ उनके दिग्गज मंत्रियों की टीम से होती थी। साल 2003 में सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और 15 साल तक प्रदेश में सरकार चलाई। इस लंबे कार्यकाल में कई नेताओं का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। कुछ मंत्री सरकार में बेहद प्रभावशाली रहे, तो कुछ ने संगठन और चुनावी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

2008 और 2013 की रमन सरकार में शामिल रहे कई नेता आज भी राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन पिछले करीब डेढ़ दशक में उनके राजनीतिक सफर में बड़ा बदलाव आया है। किसी का कद प्रदेश से निकलकर दिल्ली तक पहुंचा, किसी ने सत्ता में दोबारा वापसी की, तो कुछ नेता अब सक्रिय चुनावी राजनीति से बाहर हैं। अगर 2008, 2013 और 2026 की स्थिति को एक साथ रखकर इन नेताओं के राजनीतिक सफर को देखें, तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है।

रमन सिंह: मुख्यमंत्री से विधानसभा अध्यक्ष तक का सफर

छत्तीसगढ़ में बीजेपी की 15 साल की सत्ता की बात हो और डॉ. रमन सिंह का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। रमन सिंह 2003, 2008 और 2013 में लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में बीजेपी ने राज्य में 15 साल तक सरकार चलाई।

2018 में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई तो रमन सिंह की भूमिका जरूर बदली, लेकिन पार्टी में उनका प्रभाव कायम रहा। 2023 में बीजेपी की दोबारा सरकार बनी और विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री बने। इसके बाद रमन सिंह को विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई।

यानी मुख्यमंत्री के पद से विधानसभा अध्यक्ष तक उनका राजनीतिक सफर जरूर बदला, लेकिन वे सत्ता की व्यवस्था के केंद्र से पूरी तरह बाहर नहीं हुए। वरिष्ठ नेता के तौर पर आज भी प्रदेश बीजेपी की राजनीति में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

बृजमोहन अग्रवाल: दो दशक मंत्री रहे, अब रायपुर के सांसद

रमन सरकार के सबसे प्रभावशाली चेहरों में बृजमोहन अग्रवाल का नाम प्रमुख रहा है। छत्तीसगढ़ में बीजेपी की पहली सरकार बनने के बाद से ही वे कैबिनेट का हिस्सा रहे। 2008 और 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद भी उन्होंने मंत्री के तौर पर सरकार में अपनी जगह बनाए रखी। लंबे समय तक रायपुर के साथ-साथ प्रदेश की राजनीति में उनका मजबूत प्रभाव माना जाता रहा। कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभालने के कारण सरकार के भीतर उनका राजनीतिक कद काफी बड़ा था।

2023 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बृजमोहन अग्रवाल ने राज्य की राजनीति से लोकसभा का रुख किया। 2024 में वे रायपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। उनके अनुभव और लंबे राजनीतिक करियर को देखते हुए केंद्र में मंत्री बनाए जाने की चर्चाएं भी थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

2026 में बृजमोहन अग्रवाल रायपुर के सांसद हैं, लेकिन केंद्र सरकार में मंत्री नहीं हैं। वहीं, राज्य सरकार के साथ उनके मतभेद भी समय-समय पर सार्वजनिक होते रहे हैं। उन्होंने कई मुद्दों पर अपनी ही सरकार को पत्र लिखकर कार्रवाई या फैसलों पर पुनर्विचार की मांग की। नकटी मामले में भी उन्होंने सरकार की कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाए थे।

इस लिहाज से देखें तो करीब दो दशक तक राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले बृजमोहन अग्रवाल का राजनीतिक पद जरूर बदला है। अब वे संसद में हैं, लेकिन प्रदेश सरकार में उनकी वह भूमिका नहीं है, जो रमन सरकार के दौर में हुआ करती थी।

अमर, अजय, मूणत और मोहले: मंत्री पद गया, चुनावी जमीन कायम

रमन सरकार के कई ऐसे पुराने मंत्री हैं, जिनका राजनीतिक सफर खत्म नहीं हुआ, लेकिन अब उनके पास मंत्री पद नहीं है। अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, राजेश मूणत, पुन्नूलाल मोहले, विक्रम उसेंडी और लता उसेंडी इसी समूह में आते हैं।

अमर अग्रवाल लंबे समय तक बिलासपुर की राजनीति में बीजेपी के बड़े चेहरों में शामिल रहे। अजय चंद्राकर ने कुरुद में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत बनाए रखी। राजेश मूणत रायपुर पश्चिम की राजनीति में सक्रिय रहे, जबकि पुन्नूलाल मोहले मुंगेली से अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने में सफल रहे।

विक्रम उसेंडी का राजनीतिक सफर कुछ अलग रहा। 2013 में अंतागढ़ से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद वे मंत्री बने। इसके बाद 2014 में लोकसभा चुनाव जीतकर कांकेर से सांसद पहुंचे। बाद में उनकी राजनीति दोबारा विधानसभा तक लौटी और 2026 में वे अंतागढ़ से विधायक हैं।

लता उसेंडी के राजनीतिक सफर में भी उतार-चढ़ाव रहा। 2008 में वे मंत्री थीं, लेकिन 2013 का विधानसभा चुनाव हार गईं। इसके बाद 2023 में उन्होंने कोंडागांव से वापसी की और फिर विधायक बनीं।

इन नेताओं की कहानी बताती है कि मंत्री पद भले ही हाथ से निकल गया हो, लेकिन चुनावी राजनीति में उनकी जमीन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसलिए इनके राजनीतिक ग्राफ को नीचे आया हुआ कहा जा सकता है, लेकिन इसे राजनीतिक अंत नहीं माना जा सकता।

प्रेमप्रकाश पांडेय से ननकीराम कंवर तक, सत्ता से सक्रिय राजनीति के बाहर

रमन सरकार के कुछ ऐसे चेहरे भी हैं, जिनका राजनीतिक ग्राफ पिछले वर्षों में सबसे ज्यादा नीचे आया है। प्रेमप्रकाश पांडेय, ननकीराम कंवर, चंद्रशेखर साहू और रमशीला साहू कभी रमन सरकार के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल थे, लेकिन 2026 में इनमें से किसी के पास न विधानसभा की सदस्यता है और न मंत्री पद।

प्रेमप्रकाश पांडेय का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 2008 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने 2013 में भिलाई नगर से वापसी की और फिर रमन सरकार में मंत्री बने। यानी एक चुनाव में सत्ता से बाहर होने के बाद उन्होंने शानदार वापसी की। हालांकि, मौजूदा समय में वे न विधायक हैं और न ही सरकार में किसी पद पर हैं।

ननकीराम कंवर 2008 में रामपुर विधानसभा सीट से जीते और रमन सरकार में गृह मंत्री बने। 2013 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2018 में उन्होंने विधानसभा में वापसी की, लेकिन 2023 में फिर चुनाव हार गए। 2026 में वे विधानसभा से बाहर हैं।

चंद्रशेखर साहू भी रमन सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। 2008 में जीत के बाद उन्हें सरकार में जगह मिली, लेकिन 2013 के चुनाव में हार के बाद वे पहले जैसी सत्ता की भूमिका में वापस नहीं लौट सके।

रमशीला साहू का राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ाव वाला रहा। 2013 में दुर्ग ग्रामीण से चुनाव जीतकर वे पहली बार विधानसभा पहुंचीं और रमन सरकार में मंत्री बनीं। हालांकि, अब वे न विधायक हैं और न मंत्री।

इन चार नेताओं की कहानी बताती है कि सरकार में बड़े पद तक पहुंचने के बाद भी लंबे समय तक चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाए रखना आसान नहीं होता।

रामसेवक पैकरा: गृह मंत्री से वन विकास निगम अध्यक्ष तक

रामसेवक पैकरा को पूरी तरह राजनीति से बाहर हुए नेताओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उनका मौजूदा राजनीतिक सफर एक अलग भूमिका में जारी है।

2008 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2013 में उन्होंने प्रतापपुर से जीत हासिल कर वापसी की। इसके बाद वे रमन सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और उनके पास गृह विभाग जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी रही।

अब 2026 में वे विधायक नहीं हैं, लेकिन वन विकास निगम के अध्यक्ष हैं। यानी उनकी राजनीतिक और सरकारी भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन गृह मंत्री जैसे शक्तिशाली कैबिनेट पद की तुलना में वर्तमान जिम्मेदारी का स्तर अलग है।

रामविचार नेताम और केदार कश्यप: सत्ता में लगातार वापसी

रमन सरकार के पुराने मंत्रियों में रामविचार नेताम और केदार कश्यप ऐसे चेहरे हैं, जिनका राजनीतिक ग्राफ काफी स्थिर रहा है।

दोनों 2008 और 2013 में रमन सरकार की कैबिनेट का हिस्सा रहे। 2018 में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई, लेकिन दोनों की राजनीतिक सक्रियता बनी रही। 2023 में बीजेपी की सत्ता में वापसी के बाद दोनों फिर सरकार का हिस्सा बने और 2026 में कैबिनेट मंत्री हैं।

इनका सफर उन नेताओं से अलग है, जिन्हें मंत्री पद गंवाने के बाद सत्ता में वापसी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। सत्ता से बाहर रहने के बावजूद दोनों ने अपनी राजनीतिक जमीन बनाए रखी और सरकार में दोबारा जगह बनाने में सफल रहे।

दयालदास बघेल: हार के बाद मंत्री पद तक वापसी

दयालदास बघेल का राजनीतिक ग्राफ भी उतार-चढ़ाव के बावजूद मजबूत रहा है। 2008 और 2013 में वे नवागढ़ से विधायक रहे और 2013 के बाद रमन सरकार में मंत्री बने।

2018 में उन्हें चुनाव में हार मिली और वे पांच साल तक विधानसभा से बाहर रहे। इसके बावजूद उन्होंने राजनीति में सक्रियता बनाए रखी। 2023 में उन्होंने फिर चुनाव जीता और विष्णुदेव साय सरकार में दोबारा मंत्री बन गए।

इस तरह उनके राजनीतिक सफर में ब्रेक जरूर आया, लेकिन मंत्री पद पर वापसी ने उनके राजनीतिक कद को बनाए रखा।

विष्णुदेव साय: संगठन से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

रमन सरकार के पुराने चेहरों से अलग 2023 के बाद बीजेपी की राजनीति में विष्णुदेव साय का कद सबसे ज्यादा बढ़ने वाले नेताओं में शामिल है।

विष्णुदेव साय का राजनीतिक सफर गांव के पंच से शुरू होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा। वे चार बार लोकसभा सांसद रहे, केंद्र में राज्यमंत्री रहे और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

वे तीन बार छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। 2006 से 2010 तक उन्होंने पहली बार प्रदेश संगठन की कमान संभाली। इसके बाद 2014 में कुछ समय के लिए और फिर 2020 से 2022 तक उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।

चार बार रायगढ़ से लोकसभा सांसद और केंद्र में राज्यमंत्री रहने के बाद 2023 में बीजेपी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनाया। इस तरह उनका राजनीतिक ग्राफ प्रदेश संगठन से संसद और फिर राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचा।

अरुण साव: सांसद और प्रदेश अध्यक्ष से डिप्टी सीएम तक

विष्णुदेव साय सरकार में डिप्टी सीएम अरुण साव का राजनीतिक कद भी पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है।

अरुण साव पहले बिलासपुर से लोकसभा सांसद रहे। 2022 में उन्हें छत्तीसगढ़ बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2023 में लोरमी से विधानसभा चुनाव जीतकर वे डिप्टी सीएम बने।

इस तरह उनका सफर संगठन की जिम्मेदारी से संसद और फिर राज्य सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंचा।

विजय शर्मा: पहली बार विधायक बने और डिप्टी सीएम तक पहुंचे

विजय शर्मा लंबे समय से बीजेपी संगठन में सक्रिय रहे हैं और युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।

2023 में उन्होंने पहली बार कवर्धा से विधानसभा चुनाव जीता। इसके बाद उन्हें विष्णुदेव साय सरकार में डिप्टी सीएम बनाया गया। उनके पास गृह जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी भी है।

यानी पहली बार विधायक बनने के बाद ही उनका राजनीतिक कद सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंच गया।

ओपी चौधरी: IAS से राजनीति में आए और सरकार के अहम चेहरे बने

ओपी चौधरी का राजनीतिक सफर भी काफी अलग है। 2013 में वे राजनीति में नहीं थे, बल्कि IAS अधिकारी के तौर पर प्रशासनिक सेवा में थे। बाद में उन्होंने कलेक्टर का पद छोड़कर बीजेपी की राजनीति में प्रवेश किया।

2018 में उन्होंने खरसिया विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने राजनीति नहीं छोड़ी। 2023 में रायगढ़ से बड़ी जीत दर्ज कर वे विधानसभा पहुंचे। इसके बाद विष्णुदेव साय सरकार में उन्हें वित्त, वाणिज्यिक कर, आवास एवं पर्यावरण और योजना जैसे महत्वपूर्ण विभाग मिले।

2026 के बजट के दौरान सरकार के सबसे अहम चेहरों में उनकी भूमिका दिखाई दी। प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार ऊपर गया है।

सरोज पांडेय: राष्ट्रीय राजनीति में ऊंचाई के बाद ठहराव

रमन सरकार के दौर में छत्तीसगढ़ बीजेपी के कुछ नेताओं का प्रभाव प्रदेश की सीमाओं से बाहर तक था। सरोज पांडेय इसका बड़ा उदाहरण हैं।

महापौर से विधायक और फिर लोकसभा सांसद बनने के बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ा। बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव जैसी जिम्मेदारियां संभालने के साथ उन्होंने संगठन में मजबूत जगह बनाई।

वे महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य की प्रदेश प्रभारी और उत्तर प्रदेश की सह-प्रभारी भी रहीं। 2018 में राज्यसभा सांसद बनने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी मौजूदगी और मजबूत हुई।

हालांकि, 2024 में कोरबा लोकसभा सीट से चुनाव हारने के बाद उनकी संसदीय राजनीति पर ब्रेक लगा। इसके बाद बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में भी उन्हें जगह नहीं मिली।

इस लिहाज से देखें तो एक समय प्रदेश से निकलकर राष्ट्रीय संगठन में लगातार ऊपर बढ़ रहा उनका राजनीतिक सफर फिलहाल पहले की तुलना में ठहराव की स्थिति में है।

रेणुका सिंह: केंद्रीय मंत्री से मुख्यमंत्री की दावेदारी और फिर विधायक

रेणुका सिंह का राजनीतिक सफर भी तेजी से ऊपर गया। वे 2003 और 2008 में विधायक रहीं और रमन सरकार में महिला एवं बाल विकास विभाग की जिम्मेदारी संभाली।

2019 में सरगुजा से लोकसभा सांसद बनने के बाद वे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में जनजातीय मामलों की केंद्रीय राज्य मंत्री बनीं। इस तरह उनका राजनीतिक सफर राज्य की राजनीति से निकलकर केंद्र सरकार तक पहुंचा।

2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें भरतपुर-सोनहत से मैदान में उतारा और वे चुनाव जीत गईं। उस समय वे मुख्यमंत्री पद की प्रमुख दावेदारों में शामिल थीं। महिला और आदिवासी चेहरे को मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावनाओं के बीच उनका नाम भी चर्चा में था।

हालांकि, बीजेपी ने विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद रेणुका सिंह का राजनीतिक सफर केंद्रीय मंत्री के पद से वापस विधानसभा की राजनीति तक आ गया। फिलहाल वे भरतपुर-सोनहत की विधायक हैं।

तोखन साहू: विधायक से केंद्रीय राज्यमंत्री तक

कुछ नेताओं का राजनीतिक ग्राफ पुराने बड़े पदों की तुलना में नीचे आने के बजाय ऊपर गया है। तोखन साहू इसका उदाहरण हैं।

लोरमी से विधायक और संसदीय सचिव रहे तोखन साहू 2018 में विधानसभा चुनाव हार गए थे। इसके बाद 2024 में उन्होंने बिलासपुर लोकसभा सीट से जीत हासिल की और पहली बार सांसद बनने के बाद ही केंद्र में राज्यमंत्री बनाए गए।

यानी विधानसभा की राजनीति से बाहर होने के बाद उन्होंने लोकसभा के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया और केंद्र सरकार में जिम्मेदारी हासिल की।

संतोष पांडेय और विजय बघेल भी मजबूत स्थिति में

संतोष पांडेय और विजय बघेल भी फिलहाल मजबूत राजनीतिक स्थिति में हैं। दोनों लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे हैं।

वहीं रूपकुमारी चौधरी का राजनीतिक दायरा भी बढ़ा है। विधायक से सांसद बनने के बाद उन्हें बीजेपी महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। इससे उनका राजनीतिक सफर प्रदेश की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय संगठन तक पहुंचा है।

कुछ चेहरे लोकसभा से भी बाहर हुए

दूसरी तरफ चंदूलाल साहू, कमलभान सिंह और लखनलाल साहू जैसे नेता भी हैं, जो लोकसभा तक पहुंचे, लेकिन अब संसद में नहीं हैं।

नंदकुमार साय का राजनीतिक कद भी एक समय बीजेपी के बड़े आदिवासी नेताओं में था। वे सांसद रहने के साथ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। बीजेपी में वापसी के बावजूद फिलहाल वे किसी निर्वाचित पद पर नहीं हैं।

दीपक म्हास्के: चुनावी जीत से अलग संगठन में बढ़ी जिम्मेदारी

दीपक म्हास्के का राजनीतिक सफर चुनावी जीत के बजाय संगठन में बढ़ी जिम्मेदारी के जरिए आगे बढ़ा है। अगस्त 2026 में बीजेपी ने उन्हें आईटी सेल की राष्ट्रीय कमान सौंपी।

इस तरह उनका राजनीतिक ग्राफ चुनावी राजनीति में किसी बड़े पद के बजाय संगठनात्मक जिम्मेदारी के स्तर पर ऊपर गया है।

रमेश बैस का सफर अलग श्रेणी में

रमेश बैस को इस राजनीतिक ग्राफ में बाकी नेताओं के साथ सीधे नहीं रखा जा सकता। वे सात बार सांसद रहे और केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद तीन राज्यों के राज्यपाल भी रहे।

इसलिए उनका राजनीतिक सफर चुनावी राजनीति से निकलकर संवैधानिक पद तक पहुंचने वाला रहा है। ऐसे में उन्हें सामान्य तौर पर चुनावी पदों के आधार पर ऊपर-नीचे आंकना उचित नहीं होगा।

15 साल की सत्ता के बाद बदली तस्वीर

रमन सरकार के दौर के इन नेताओं की मौजूदा स्थिति को देखें तो बीजेपी की 15 साल की सत्ता के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई बड़े बदलाव हुए हैं। कुछ पुराने चेहरे आज भी सत्ता में हैं, कुछ सांसद बनकर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंच चुके हैं, कुछ संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और कुछ सक्रिय चुनावी राजनीति से बाहर हो चुके हैं।

वहीं, विष्णुदेव साय सरकार में कई नए चेहरों का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा है। अरुण साव, विजय शर्मा और ओपी चौधरी जैसे नेताओं ने कम समय में सरकार के शीर्ष स्तर पर अपनी जगह बनाई है।

Chhattisgarh BJP Leaders: इस तरह 2008 और 2013 की रमन सरकार के दिग्गजों से 2026 की साय सरकार तक पहुंचते-पहुंचते बीजेपी के राजनीतिक चेहरे और उनकी भूमिकाएं काफी बदल चुकी हैं। किसी का ग्राफ मुख्यमंत्री से विधानसभा अध्यक्ष तक पहुंचा, कोई मंत्री से सांसद बना, किसी ने केंद्रीय राजनीति में जगह बनाई, तो कुछ नेता अब चुनावी राजनीति से बाहर हैं। वहीं कुछ पुराने नेताओं ने हार और राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद सत्ता में दोबारा वापसी कर अपना प्रभाव बनाए रखा है।

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