नई दिल्ली [Nishanebaaz News]। पश्चिम एशिया (Middle East) में जारी सैन्य संघर्ष और तनाव का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) की कीमतों में आई तेजी के कारण चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत का नेट ऑयल एंड गैस इंपोर्ट बिल (Net Oil & Gas Import Bill) 43.4 फीसदी बढ़कर 57.8 अरब डॉलर पहुंच गया है।
पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि (अप्रैल-जुलाई) में भारत ने तेल और गैस के आयात पर 40.3 अरब डॉलर खर्च किए थे। यानी इस बार भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए करीब 17.5 अरब डॉलर (लगभग ₹1.46 लाख करोड़) अतिरिक्त चुकाने पड़े हैं।
क्यों बढ़ा भारत का खर्च? (मात्रा वही, लेकिन कीमतें बढ़ीं)
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 88 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है। भारत के क्रूड ऑयल, एलएनजी और एलपीजी के आयात का सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से ही आता है।
हालिया महीनों में हॉर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के आसपास सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ गईं:
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कच्चे तेल की मात्रा: अप्रैल-जुलाई के दौरान भारत ने 81.9 मिलियन टन कच्चा तेल खरीदा, जो पिछले साल के मुकाबले महज 0.5% अधिक है।
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क्रूड ऑयल का बिल: हालांकि, खर्च की बात करें तो क्रूड ऑयल का बिल 40.5 अरब डॉलर से सीधा बढ़कर 63.4 अरब डॉलर हो गया। यानी केवल कीमतों में तेजी की वजह से खर्च में 56.5 फीसदी की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
एलएनजी (LNG) आयात पर भी बढ़ा आर्थिक बोझ
नेचुरल गैस के मोर्चे पर भी भारत का आयात बिल काफी बढ़ा है। अप्रैल-जुलाई की अवधि में भारत का एलएनजी आयात 11,269 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर से बढ़कर 11,867 एमएससीएम हुआ।
मात्रा में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद एलएनजी आयात पर भारत का कुल खर्च 4.5 अरब डॉलर से बढ़कर 5.6 अरब डॉलर हो गया, जो कि 24.4 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है।
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
भारत के कुल आयात बिल में ऊर्जा का हिस्सा सबसे अधिक होता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खींचता है और कच्चे तेल के दाम उच्च स्तर पर बने रहते हैं, तो इसका असर केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहेगा:
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महंगाई और रुपया: महंगा ईंधन देश में परिवहन लागत बढ़ाएगा, जिससे खाद्य पदार्थों और दैनिक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। साथ ही डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ेगा।
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ईंधन की दरें: पेट्रोल और डीजल की रिटेल दरों में कटौती की संभावनाएं खत्म हो गई हैं, और आने वाले दिनों में कीमतें बढ़ने का जोखिम भी बढ़ गया है।





