कोयलीबेड़ा (बस्तर): आज के डिजिटल दौर में जहां शादियों को यादगार बनाने के लिए हाई-टेक फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी का सहारा लिया जाता है, वहीं बस्तर के कोयलीबेड़ा क्षेत्र के कागबरस, चीलपरस और गुंदुल गांवों में एक सदियों पुरानी परंपरा अब भी जीवित है। यहां के आदिवासी शादी की स्मृति के लिए लकड़ी के स्तंभ या स्मारक लगाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमिट निशानी बन जाता है।
कैमरों के बिना शादी की यादें
उत्तर बस्तर के ग्रामीण शादी के बाद अपने घरों के सामने बड़े लकड़ी के स्तंभ लगाते हैं। यह स्तंभ विवाह के समय मड़वा मंडप के बीच स्थित “मांडो” से लिया जाता है और उसे घर के बाहर स्मृति चिन्ह के रूप में स्थापित किया जाता है।
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स्थानीय आदिवासी बताते हैं कि यह परंपरा उन्हें सांस्कृतिक रूप से जोड़ती है और पीढ़ियों तक उनकी शादी की याद को जीवित रखती है।
सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व
कागबरस और आसपास के गांवों में यह परंपरा न केवल विवाह की याद को संजोती है, बल्कि आदिवासी जीवन और परंपराओं का भी प्रतीक है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि आधुनिक तकनीक की चकाचौंध के बीच भी सांस्कृतिक जड़ें बनी रहें।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्तंभ मृत्यु और शादी दोनों मामलों में लगाया जाता है — विवाह में यह “स्मृति स्तंभ” के रूप में, जबकि मृत्यु के समय पत्थर या लकड़ी का स्मारक बनाया जाता है।
आधुनिकता के बावजूद परंपरा का संरक्षण
आज भी युवा पीढ़ी इस परंपरा को निभाती है। आदिवासी मानते हैं कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और समुदाय के प्रति सम्मान को बनाए रखता है। इस तरह, कागबरस और आसपास के गांवों में शादी की यादें सिर्फ लकड़ी और स्मारक के माध्यम से अमिट बनती हैं।











