बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी नेता का घटिया बयान, कहा- महिलाओं का काम बच्चे पैदा करना…नेता बनना नहीं

Rahul Goshwami

निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : बांग्लादेश की कट्टरपंथी राजनीतिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी एक बार फिर अपने विचारों को लेकर चर्चा में है। पार्टी के वरिष्ठ नेता शफीकुर रहमान ने महिलाओं के नेतृत्व को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहस छेड़ दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जमात-ए-इस्लामी की कभी कोई महिला प्रमुख नहीं बन सकती।

धार्मिक और जैविक तर्कों का दिया हवाला

अल-जजीरा को दिए गए इंटरव्यू में शफीकुर रहमान ने अपने बयान को ‘धार्मिक जिम्मेदारियों’ और ‘जैविक सीमाओं’ से जोड़ते हुए सही ठहराने की कोशिश की। उनका कहना था कि अल्लाह ने पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग भूमिकाओं के लिए बनाया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पुरुष बच्चे पैदा नहीं कर सकते या स्तनपान नहीं करा सकते, उसी तरह महिलाएं पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं।

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चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं

रहमान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं। खास बात यह है कि जमात-ए-इस्लामी ने इन चुनावों में एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारी है। जब इस पर सवाल उठाया गया, तो उन्होंने इसे देश की सांस्कृतिक संरचना और वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ दिया।

महिला नेतृत्व पर सवाल और विरोधाभास

जब उन्हें याद दिलाया गया कि बांग्लादेश पहले भी महिला प्रधानमंत्री देख चुका है, तो शफीकुर रहमान ने कहा कि दुनिया के अधिकांश देशों में इसे व्यावहारिक मॉडल नहीं माना गया है। उनके इस बयान को आलोचक बांग्लादेश के लोकतांत्रिक इतिहास और महिलाओं की राजनीतिक भूमिका से पूरी तरह उलट बता रहे हैं।

महिला अधिकारों पर बढ़ती चिंता

यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब बांग्लादेश में महिलाओं की सुरक्षा, राजनीतिक भागीदारी और अधिकारों को लेकर पहले से ही गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं। यूरेशिया रिव्यू की रिपोर्ट के अनुसार, देश में बढ़ती अराजकता और महिलाओं के प्रति असहिष्णु माहौल के कारण कई महिलाएं चुनाव लड़ने से डर रही हैं।

चुनाव दो वजहों से सुर्खियों में

12 फरवरी को होने वाले चुनाव दो कारणों से चर्चा में हैं। पहला, बांग्लादेश की सबसे पुरानी पार्टी अवामी लीग इन चुनावों में हिस्सा नहीं ले रही है क्योंकि यूनुस सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगाया है। दूसरा, चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं की बेहद कम भागीदारी, जो लोकतांत्रिक संतुलन पर सवाल खड़े कर रही है।

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