Mysore Dasara : मैसूर दशहरा: परंपरा, भव्यता और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम, भारत के अन्य राज्यों से अलग है मैसूर का दशहरा, जानिए क्यों है इतना मशहूर

Sanjay Sahu
Mysore Dasara

Mysore Dasara : मैसूर का दशहरा (Mysore Dasara) भारत के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक त्योहारों में से एक है, जिसकी पहचान देश के अन्य राज्यों में मनाए जाने वाले दशहरे से बिल्कुल अलग है। यह पर्व न तो रावण दहन के लिए जाना जाता है, न ही राम की विजयगाथा के लिए, बल्कि यह देवी चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर वध की गाथा और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रतीक है।

Mysore Dasara : क्यों खास है मैसूर दशहरा?

मैसूर दशहरा को कर्नाटक राज्य का ‘राज्योत्सव’ घोषित किया गया है। यह पर्व 10 दिनों तक चलता है और पूरे मैसूर शहर को दीपों और सजावटी रोशनी से सजा दिया जाता है। इसका समापन विजयादशमी के दिन भव्य ‘जंबो सवारी’ (हाथियों की शोभायात्रा) के साथ होता है, जो मैसूर पैलेस से निकलती है और बन्नीमंटप पर समाप्त होती है।

इस दौरान देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को सोने से जड़े हौदे में एक सुसज्जित हाथी पर विराजमान कर पूरे शहर में घुमाया जाता है। शोभायात्रा में घोड़े, ऊँट, पारंपरिक नृत्य दल, संगीत, सांस्कृतिक झांकियां और ढोल-नगाड़ों के साथ शहर की सड़कों पर भारी जनसमूह उमड़ता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मैसूर दशहरा की शुरुआत विजयनगर साम्राज्य के शासकों द्वारा 15वीं शताब्दी में की गई थी। इसके बाद यह परंपरा मैसूर के वोडेयार राजवंश द्वारा आगे बढ़ाई गई। राजा वोडेयार I ने 1610 में श्रीरंगपटना से दशहरे की परंपरा की शुरुआत की, जिसे बाद में मैसूर पैलेस में भव्य रूप से मनाया जाने लगा।

दशहरा के दौरान, राज परिवार द्वारा विशेष ‘दरबार’ का आयोजन किया जाता था, जो आज भी प्रतीकात्मक रूप से मनाया जाता है। वर्तमान में भी शाही तलवार की पूजा और पारंपरिक विधि से आयोजन किया जाता है।

मैसूर पैलेस की रोशनी और सजावट

त्योहार के 10 दिनों तक हर शाम मैसूर पैलेस को लगभग 1 लाख बल्बों से रोशन किया जाता है, जो एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। यहां आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कर्नाटक के **शास्त्रीय नृत्य, संगीत, रंगमंच और लोककला का सुंदर प्रदर्शन होता है।

जंबो सवारी और बन्नी वृक्ष की पूजा

विजयादशमी के दिन शोभायात्रा का मुख्य आकर्षण देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति होती है, जिसे पारंपरिक रूप से सजाए गए हाथी पर स्वर्ण हौदे में विराजमान किया जाता है। यात्रा का अंतिम पड़ाव बन्नीमंटप होता है, जहां बन्नी वृक्ष की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों ने अपने शस्त्र इसी पेड़ के नीचे छिपाए थे।

पंजिना कवायत्थु – मशाल परेड

शोभायात्रा के समापन पर रात्रि में आयोजित होती है ‘पंजिना कवायत्थु’, यानी मशाल परेड, जो कि सैन्य कौशल, अनुशासन और वीरता का प्रतीक है। यह कार्यक्रम दशहरे की शान में चार चांद लगा देता है।

दशहरा प्रदर्शनी

दशहरे के दौरान मैसूर पैलेस के सामने विशाल दशहरा प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है, जो दिसंबर तक चलती है। यहां राज्य के विकास कार्यों, शिल्प, हथकरघा, खाद्य सामग्री और झूलों सहित अनेक मनोरंजन साधनों की प्रदर्शनी लगती है। इसका आयोजन कर्नाटक प्रदर्शनी प्राधिकरण (KEA) करता है।

अंतरराष्ट्रीय आकर्षण

मैसूर दशहरा सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। हर साल लाखों लोग देश-विदेश से इसे देखने आते हैं। यह पर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि **कर्नाटक की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का जीवंत उत्सव** है, जिसे पीढ़ियों से संजोया जा रहा है।

Mysore Dasara : मैसूर दशहरा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कला, संस्कृति, इतिहास और जन-आस्था का महा संगम है। इसकी भव्यता, शाही परंपराएं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां इसे भारत के सभी दशहरा आयोजनों में विशिष्ट स्थान दिलाती हैं। अगर आपने अब तक मैसूर दशहरा नहीं देखा, तो यह एक ऐसा अनुभव है जिसे हर भारतीय को कम से कम एक बार जरूर देखना चाहिए।

Share The News
1
0
Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *