Health: शारदीय नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी को ज्ञान, आरोग्य और सिद्धियां प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों के साथ अलग-अलग औषधीय पौधों का संबंध भी बताया जाता है। इसी परंपरा में शतावरी का नाम लिया जाता है, जिसे मां सिद्धिदात्री को अर्पित करने की मान्यता है।
धार्मिक आस्था से अलग, शतावरी आयुर्वेद में लंबे समय से इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी-बूटी है। इसकी जड़ का उपयोग पारंपरिक रूप से शरीर को पोषण देने और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं में सहायक उपाय के तौर पर किया जाता रहा है।
महिलाओं की सेहत के लिए पारंपरिक इस्तेमाल
आयुर्वेद में शतावरी का इस्तेमाल महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ समस्याओं के लिए किया जाता रहा है। स्तनपान के दौरान दूध बनने में मदद के लिए भी इसका पारंपरिक उपयोग बताया जाता है। हालांकि, इस उद्देश्य से शतावरी की प्रभावशीलता को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं।
पाचन और एसिडिटी में क्या है भूमिका?
शतावरी का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में पेट की जलन और एसिडिटी जैसी परेशानियों में भी किया जाता रहा है। इसमें कुछ प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सिडेंट गुण हो सकते हैं। ये शरीर में ऑक्सिडेटिव तनाव से जुड़े प्रभावों को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। फिर भी, एसिडिटी या पाचन संबंधी किसी समस्या के इलाज के लिए केवल शतावरी पर निर्भर रहना उचित नहीं है।
पाउडर या कैप्सूल, कैसे करते हैं सेवन?
बाजार में शतावरी पाउडर, कैप्सूल और दूसरे आयुर्वेदिक मिश्रण उपलब्ध हैं। पारंपरिक रूप से इसके पाउडर को दूध या गुनगुने पानी के साथ लेने की सलाह दी जाती है। लेकिन इसकी सही मात्रा व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, जरूरत और इस्तेमाल किए जा रहे उत्पाद पर निर्भर करती है। इसलिए बिना जानकारी के इसकी मात्रा तय करना या लंबे समय तक सप्लीमेंट लेना ठीक नहीं है।
सेवन से पहले इन सावधानियों का रखें ध्यान
शतावरी प्राकृतिक जड़ी-बूटी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित हो। गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं और नियमित दवाएं लेने वाले लोगों को इसका सप्लीमेंट शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। किसी बीमारी का इलाज चल रहा हो, तो निर्धारित दवाओं की जगह शतावरी का इस्तेमाल न करें।