जगदलपुर। Nishaanebaz.com-Bastar Dussehra Bel Puja: अपनी अनूठी परंपराओं, सदियों पुरानी संस्कृति और लोक आस्था के लिए पूरी दुनिया में विख्यात बस्तर दशहरा पर्व के दौरान सप्तमी के अवसर पर एक बेहद खास और पारंपरिक रस्म अदा की गई। जिला मुख्यालय जगदलपुर से करीब 6 किलोमीटर दूर स्थित सरगीपाल गांव में बेल पूजा का यह अनुष्ठान पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस विशेष पूजा का बस्तर के इतिहास और धार्मिक अनुष्ठानों में बहुत अधिक महत्व माना जाता है, क्योंकि यहां जोड़ी बेल फल के माध्यम से मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी को बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
सरगीपाल गांव में निभाई जाने वाली इस बेल पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, इस अनूठी रस्म का इतिहास चालुक्य वंश के एक राजा के समय की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि प्राचीन काल में राजा शिकार के सिलसिले में जंगल गए थे, जहां वे एक बेल वृक्ष के नीचे दो बेहद सुंदर कन्याओं से मिले और उनसे विवाह की इच्छा प्रकट की। तब उन कन्याओं ने राजा को बारात लेकर आने का वचन लिया था। अगले दिन जब राजा अपनी बारात के साथ वहां पहुंचे, तो उन कन्याओं ने अपने वास्तविक स्वरूप में आते हुए खुद को मां माणिकेश्वरी और मां दंतेश्वरी बताया। इस अद्भुत घटना के बाद राजा ने क्षमा मांगते हुए दोनों देवियों से बस्तर दशहरा उत्सव में सम्मिलित होने की प्रार्थना की थी। तभी से चली आ रही इस परंपरा के तहत हर साल यह रस्म निभाई जाती है।
स्थानीय जानकार हेमंत कश्यप बताते हैं कि इस पूरी परंपरा में जोड़ी बेल फल को दोनों देवियों का जीवंत प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष ‘बेल न्योता’ के दौरान राजपरिवार के प्रतिनिधि सरगीपाल पहुंचते हैं और वहां के पुजारियों से विधि-विधान के साथ जोड़ी बेल फल स्वीकार करते हैं। इस पवित्र फल को बाद में जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में पूरी पूजा-अर्चना के साथ स्थापित किया जाता है। रविवार को आयोजित इस रस्म के दौरान सरगीपाल गांव में किसी बड़े उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला, जहां राजपरिवार के सदस्यों, दशहरा समिति के पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
बस्तर दशहरा में निभाई जाने वाली 12 से अधिक अनूठी और प्रमुख रस्मों में बेल पूजा का अपना विशेष स्थान है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखती है। सप्तमी के दिन बेल पूजा की इस महत्वपूर्ण रस्म के संपन्न होने के बाद अब आगामी सोमवार को महाअष्टमी की रात्रि में ‘निशा जात्रा’ की रस्म अदा की जाएगी। सरगीपाल गांव में संपन्न हुए इस आयोजन ने एक बार फिर बस्तर की प्राचीन लोक कथाओं और ऐतिहासिक धरोहरों को लोगों के सामने ला दिया है, जिसमें आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की गहरी प्रेरणा मिलती है।