Phone Charger E-Waste: निशानेबाज न्यूज़ डेस्क- कुछ साल पहले तक नया स्मार्टफोन खरीदते समय बॉक्स खोलते ही फोन के साथ चार्जिंग अडैप्टर मिलना तय माना जाता था। अब तस्वीर बदल चुकी है। कई कंपनियों ने अपने फोन के बॉक्स से चार्जर हटाना शुरू कर दिया है। ग्राहक को फोन के साथ केबल तो मिलती है, लेकिन पावर अडैप्टर अलग से खरीदना पड़ सकता है।
एप्पल के आईफोन बॉक्स में अब पावर अडैप्टर नहीं दिया जाता। कंपनी फोन के साथ यूएसबी-सी केबल देती है और पहले से मौजूद संगत अडैप्टर इस्तेमाल करने की सलाह देती है। इसी तरह सैमसंग के गैलेक्सी एस25 के बॉक्स में फोन, डेटा केबल और इजेक्शन पिन मिलता है, लेकिन ट्रैवल अडैप्टर नहीं दिया जाता।ऐसे में नया फोन खरीदने वाले ग्राहक के सामने अब एक और सवाल खड़ा हो गया है—क्या घर में पहले से उपयुक्त चार्जर मौजूद है या नया अडैप्टर खरीदना पड़ेगा?
कंपनियां पर्यावरण बचाने की बात करती हैं
चार्जर हटाने के पीछे कंपनियों की सबसे बड़ी दलील यह है कि बहुत से लोगों के घर में पहले से चार्जर मौजूद होता है। ऐसे में हर नए फोन के साथ एक और अडैप्टर देने से इलेक्ट्रॉनिक सामान की संख्या बढ़ती है।चार्जर को बॉक्स से हटाने पर पैकेजिंग छोटी हो सकती है। इससे एक साथ ज्यादा फोन ले जाना संभव होता है और परिवहन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों में भी कमी आ सकती है। इसी आधार पर इसे पर्यावरण के लिए बेहतर कदम बताया जाता है।लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है।
क्या ग्राहक का खर्च बढ़ रहा है?
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट में इंडस्ट्री एंड रिन्यूएबल एनर्जी प्रोग्राम के डायरेक्टर निवित कुमार यादव के अनुसार, चार्जर हटाने को सिर्फ पर्यावरण से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उनके अनुसार, इसके पीछे बाजार से जुड़े कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
एक अच्छा चार्जर करीब ₹1,500 तक का हो सकता है। अगर ग्राहक के पास पहले से उपयुक्त अडैप्टर नहीं है, तो फोन खरीदने के बाद उसे यह खर्च अलग से करना पड़ सकता है। वहीं सस्ता और स्थानीय चार्जर इस्तेमाल करने पर चार्जिंग की गति और गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।यानी बॉक्स छोटा जरूर हो गया, लेकिन ग्राहक के लिए जरूरी सामान की कीमत पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
भारत में ई-वेस्ट तेजी से बढ़ रहा है
चार्जर को लेकर बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे यानी ई-वेस्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में देश में करीब 12.54 लाख टन ई-वेस्ट दर्ज हुआ था।वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 13.98 लाख टन हो गया। यानी एक साल में ई-वेस्ट में लगभग 11.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में पैदा हुए ई-वेस्ट का करीब 70.71 फीसदी हिस्सा संग्रह, अलग करने और रिसाइक्लिंग या निपटान की प्रक्रिया में दर्ज किया गया।वहीं ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024 ने 2022 में भारत के ई-वेस्ट का अनुमान करीब 41 लाख टन लगाया था। आधिकारिक आंकड़ों और वास्तविक स्थिति में अंतर संभव है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक कचरे का एक हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में चला जाता है और वह पूरी तरह औपचारिक व्यवस्था में दर्ज नहीं हो पाता।
एक चार्जर छोटा है, लेकिन करोड़ों फोन बड़ा सवाल
एक चार्जर देखने में बहुत छोटा इलेक्ट्रॉनिक सामान है। लेकिन भारत जैसे बड़े स्मार्टफोन बाजार में जब करोड़ों फोन बिकते हैं, तो हर फोन के साथ एक अडैप्टर हटाने का कुल प्रभाव बड़ा हो सकता है।काउंटरपॉइंट के अनुसार, 2025 में भारत के स्मार्टफोन बाजार में बिक्री की मात्रा करीब 1 फीसदी बढ़ी, जबकि बाजार की कुल वैल्यू करीब 8 फीसदी बढ़ी। इसका मतलब है कि स्मार्टफोन बाजार में पैसा लगातार बढ़ रहा है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खपत भी महत्वपूर्ण स्तर पर बनी हुई है।ऐसे में ई-वेस्ट पर चर्चा सिर्फ चार्जर तक सीमित रखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
पुराना फोन और चार्जर आखिर जाते कहां हैं?
ई-वेस्ट विशेषज्ञ निवित यादव के अनुसार, पहले फोन लंबे समय तक इस्तेमाल किए जाते थे, जबकि अब उपकरणों को बदलने का चक्र छोटा हो गया है। उनका अपना पहला फोन करीब 10 साल तक चला था। आज फोन के जल्दी बदलने से पुराने उपकरणों के निपटारे की चुनौती बढ़ती है।ई-वेस्ट कम करने के लिए सिर्फ कचरा जमा करना पर्याप्त नहीं है। ऐसे उत्पादों की जरूरत है जिन्हें इस्तेमाल के बाद आसानी से खोला, अलग किया और रिसाइकिल किया जा सके।यही वजह है कि फोन की बिक्री के साथ उसके पूरे जीवनचक्र पर ध्यान देने की जरूरत बताई जा रही है।
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कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ फोन बेचने तक नहीं
भारत में ई-वेस्ट के प्रबंधन के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी EPR व्यवस्था लागू है। इसके तहत उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की ई-वेस्ट के संग्रह और रिसाइक्लिंग को लेकर जिम्मेदारी तय की गई है।निवित यादव के अनुसार, बड़ी कंपनियों को टेक-बैक व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए। यानी ग्राहक जब पुराना फोन बदलने जाए, तो कंपनी उसके पुराने डिवाइस को वापस लेने और उसे उचित रिसाइक्लिंग व्यवस्था तक पहुंचाने में भूमिका निभाए।इससे ग्राहक को भी यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि पुराने फोन, चार्जर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान को कहां जमा करना है।
ई-वेस्ट की समस्या सिर्फ चार्जर से बड़ी
फोन के बॉक्स से चार्जर हटाना ई-वेस्ट कम करने की दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन इससे पूरी समस्या हल नहीं होती। अगर फोन जल्दी बदले जाते रहें, पुराने डिवाइस घरों में पड़े रहें या अनौपचारिक कबाड़ व्यवस्था में चले जाएं, तो ई-वेस्ट का संकट बना रहेगा।
पुराने फोन में कई धातुएं और दूसरे मूल्यवान संसाधन होते हैं, जिन्हें सही तरीके से रिसाइकिल करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि नए फोन के डिब्बे में चार्जर दिया जा रहा है या नहीं।बड़ा सवाल यह है कि नया फोन बेचने वाली कंपनियां पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान की वापसी और रिसाइक्लिंग को कितना आसान बनाती हैं। क्योंकि ई-वेस्ट की समस्या सिर्फ बॉक्स से चार्जर गायब होने से खत्म नहीं होगी; इसके लिए पूरे इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद के इस्तेमाल से लेकर उसके अंतिम निपटारे तक की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।






