धर्म: पितृपक्ष की शुरुआत होते ही बिहार का गया जी धाम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है। यहाँ लाखों लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने पहुँचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गया जी में एक ऐसा रहस्यमयी और पवित्र मंदिर भी है, जहाँ इंसान अपने जीवनकाल में ही खुद का श्राद्ध और पिंडदान कर सकता है? इसे लेकर कई तरह की धार्मिक परंपराएं और मान्यताएं प्रचलित हैं।
जनार्दन मंदिर में होता है आत्मश्राद्ध
गया के भस्मकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित जनार्दन मंदिर को इस परंपरा से जोड़ा जाता है। यहां भगवान विष्णु को जनार्दन स्वरूप में पूजा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की संतान नहीं है या जिन्हें मृत्यु के बाद श्राद्ध-पिंडदान करने वाला कोई नहीं होगा, वे जीवनकाल में ही आत्मश्राद्ध कर सकते हैं। कुछ वैरागी और संन्यास परंपराओं में भी जीवन रहते श्राद्ध करने की प्रथा का उल्लेख मिलता है।
जीते-जी पिंडदान क्यों करते हैं?
मान्यता है कि जीवनकाल में आत्मश्राद्ध करने से व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद होने वाले श्राद्ध कर्म को पहले ही पूरा कर देता है। श्रद्धालु इसे आत्मा की सद्गति और मोक्ष की कामना से जोड़कर देखते हैं।
हालांकि यह धार्मिक विश्वास और परंपरा का विषय है। अलग-अलग पुरोहित परंपराओं में इसकी विधि और मान्यताओं में अंतर हो सकता है।
तीन दिनों में पूरी होती है रस्म
जनार्दन मंदिर से जुड़ी आत्मश्राद्ध की परंपरा को तीन चरणों में पूरा किए जाने की बात कही जाती है।
पहले दिन संकल्प और प्रायश्चित की प्रक्रिया होती है। दूसरे दिन भगवान जनार्दन की विशेष पूजा और मंत्र जाप किया जाता है। तीसरे दिन दही और चावल से तैयार पिंड अर्पित किए जाते हैं। इस विशेष अनुष्ठान में काले तिल का इस्तेमाल नहीं किए जाने की परंपरा भी बताई जाती है।
इसी अनोखी धार्मिक परंपरा के कारण गया का जनार्दन मंदिर पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।






