Friday, September 25, 2026
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Indresh Maharaj Raipur: इंद्रेश महाराज बोले- रिलेशनशिप से ज्यादा जरूरी है करियर और जीवन का उद्देश्य, Gen-Z को दी सोच बदलने की सलाह

Indresh Maharaj Raipur
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Indresh Maharaj Raipur: रायपुर। कथावाचक इंद्रेश महाराज ने गुरुवार को रायपुर में Gen-Z के युवाओं और छात्रों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने रिलेशनशिप, पढ़ाई, करियर, सफलता, भक्ति, सोशल मीडिया और जीवन के उद्देश्य जैसे मुद्दों पर युवाओं के सवालों के जवाब दिए। उन्होंने कहा कि आज कई युवा पढ़ाई और भविष्य की चिंता से ज्यादा रिलेशनशिप और सोशल मीडिया पर ध्यान दे रहे हैं। युवाओं को अपनी सोच और फैसले खुद लेने चाहिए, केवल दोस्तों के दबाव में कोई काम नहीं करना चाहिए।

Indresh Maharaj Raipur: रिलेशनशिप में भरोसा और जिम्मेदारी जरूरी

इंद्रेश महाराज ने कहा कि किसी भी रिश्ते में भरोसा, स्पष्टता और जिम्मेदारी जरूरी है। उन्होंने रिलेशनशिप की अलग-अलग परिस्थितियों का उदाहरण देते हुए कहा कि रिश्तों को विकल्प या खेल की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। कई बार व्यक्ति एक रिश्ते में रहते हुए दूसरे व्यक्ति से भी उसी तरह जुड़ा रहता है, जबकि कोई तीसरा व्यक्ति पहले रिश्ते के टूटने का इंतजार करता रहता है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में भावनाओं और जिम्मेदारियों को समझना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि कॉलेज और स्टूडेंट लाइफ में युवाओं का ध्यान पढ़ाई और भविष्य के बजाय रिलेशनशिप पर ज्यादा केंद्रित होना चिंता का विषय हो सकता है। युवाओं को अपने जीवन के उद्देश्य पर भी ध्यान देना चाहिए।

उन्होंने पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर कहा कि सबसे बड़ा व्रत एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहना है। जीवनभर प्रेम, भरोसा और साथ बनाए रखना रिश्ते की महत्वपूर्ण पहचान है।

जाति के बाद Gen-Z और Gen-Alpha के नाम पर न बंट जाएं समाज

इंद्रेश महाराज ने कहा कि समाज पहले ही जाति, वर्ग और अलग-अलग पहचानों के नाम पर बंटा हुआ है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में पीढ़ियों की पहचान को लेकर भी इसी तरह का विभाजन देखने को मिल सकता है और सवाल उठ सकता है कि कौन Gen-Z है, कौन Millennial और कौन Gen-Alpha। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पीढ़ियों को अलग परिस्थितियां और सुविधाएं मिली हैं, इसलिए उनकी सोच में अंतर होना स्वाभाविक है। इसका मतलब यह नहीं कि कोई पीढ़ी बड़ी या छोटी है। सबसे पहले इंसान बनना और इंसानियत को समझना जरूरी है।

सोशल मीडिया को लेकर भी दी सलाह

इंद्रेश महाराज ने कहा कि पहले लोगों के विनाश के लिए बम और हथियारों का इस्तेमाल होता था, लेकिन आज सोशल मीडिया के जरिए लोगों की सोच और बुद्धि को प्रभावित किया जा रहा है। उनके मुताबिक सोशल मीडिया पर राग-द्वेष, ईर्ष्या और नकारात्मकता का असर लोगों के विचारों और रिश्तों पर भी पड़ रहा है।

मॉडर्न सक्सेस और भक्ति साथ चल सकते हैं

एक छात्र के सवाल पर इंद्रेश महाराज ने कहा कि आधुनिक सफलता और भक्ति साथ-साथ चल सकती हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना नहीं है। अगर कोई युवा केवल दोस्तों के दबाव में क्लब या किसी ऐसी जगह जाता है, जहां जाना उसे पसंद नहीं, तो यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है।

उन्होंने युवाओं से कहा कि ऐसे दोस्तों का चुनाव करें, जो उन्हें सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाएं। उन्होंने एक युवती का उदाहरण देते हुए बताया कि वह पहले IAS अधिकारी बनना चाहती थी और बाद में अपनी कमाई से कथा कराने का संकल्प रखती थी। इंद्रेश महाराज ने कहा कि युवाओं को अपने उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए और केवल इस डर से कोई काम नहीं करना चाहिए कि दोस्त उनसे दूर हो जाएंगे।

दूसरों से तुलना करने पर क्या बोले?

इंद्रेश महाराज ने कहा कि दूसरों से अपनी तुलना करना इंसानी स्वभाव है। अक्सर व्यक्ति को लगता है कि सामने वाला उससे ज्यादा खुश है। उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि लोगों को उनका जीवन आनंदपूर्ण दिखाई देता है, लेकिन उनके ऊपर बड़ी संख्या में लोगों के सामने कथा करने, लाइव प्रसारण और आलोचनाओं का दबाव भी रहता है। उन्होंने कहा कि भक्ति के बाद व्यक्ति की भावना बदलने लगती है। फिर वह यह सोचने के बजाय कि दूसरा उससे ज्यादा खुश क्यों है, उसके सुखी होने की कामना करने लगता है।

मेहनत क्यों करें, अगर सब पहले से लिखा है?

इस सवाल पर इंद्रेश महाराज ने कहा कि किसी को यह पता नहीं होता कि उसके जीवन में वास्तव में क्या लिखा है। इसलिए प्रयास करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मंजिल तय होने के बावजूद रास्ते में आने वाली परेशानियों का पहले से पता नहीं होता। ऐसे में व्यक्ति को कठिनाइयों के बारे में सोचते रहने के बजाय अपनी मंजिल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मेहनत पूरी करनी चाहिए, लेकिन परिणाम को लेकर इच्छाओं का बोझ बहुत ज्यादा नहीं रखना चाहिए। जीवन में मुश्किलें और अनिश्चितताएं आएंगी, लेकिन व्यक्ति को अपने उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिए।

सफलता का डर हो तो क्या करें?

एक छात्र के सवाल पर उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि व्यक्ति अपने लिए जी रहा है या दूसरों की इच्छाएं पूरी करने के लिए। उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके पिता चाहते थे कि वह कथावाचक न बनें, जबकि वह सिंगर बनना चाहते थे।

उन्होंने कहा कि बाद में उनके नाना ने उन्हें समझाया कि जीवन में ऐसा उद्देश्य चुनना चाहिए, जिससे भीतर संतुष्टि मिले। उन्होंने युवाओं से कहा कि केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। अपने जीवन का उद्देश्य तय कर उसी दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है।

गलत काम से बचने के लिए माहौल बदलें

इंद्रेश महाराज ने कहा कि आसपास का वातावरण व्यक्ति के व्यवहार और सोच को प्रभावित करता है। अगर कोई व्यक्ति लगातार ऐसे लोगों के साथ रहता है, जो गलत कामों को सामान्य बताते हैं, तो धीरे-धीरे उसे भी वही सही लगने लग सकता है।

उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि गलत कामों में लगे लोगों से दूरी बनाने की कोशिश करें। अगर पूरी तरह दूरी संभव न हो तो ध्यान, एकांत और भगवान के स्मरण के जरिए मन को स्थिर रखने का प्रयास किया जा सकता है।

Indresh Maharaj Raipur: दुख आने पर भक्ति कैसे मदद करती है?

जीवन में दुख को लेकर पूछे गए सवाल पर इंद्रेश महाराज ने भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि धार्मिक कथाओं में भी भगवान के जीवन में कठिन परिस्थितियों का वर्णन मिलता है।

Indresh Maharaj Raipur: उन्होंने कहा कि भक्ति जीवन से सभी दुखों को खत्म करने का दावा नहीं करती, लेकिन व्यक्ति को दुखों का सामना करने की मानसिक शक्ति दे सकती है। इसे समझाते हुए उन्होंने भक्ति की तुलना एनेस्थीसिया से की और कहा कि जैसे ऑपरेशन होता है, लेकिन एनेस्थीसिया दर्द की अनुभूति कम कर देता है, उसी तरह भक्ति कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति को संभालने में मदद कर सकती है।

 

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