Chhattisgarh Unique Village: छत्तीसगढ़ में अनोखी परंपरा: यहां नहीं होती पत्थर की मूर्तियों की पूजा, कई देवगुड़ियों में महिलाओं के प्रवेश के भी अलग नियम

Sanjay Sahu
Chhattisgarh Unique Village

Chhattisgarh Unique Village: बस्तर। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ अपनी घनी हरियाली, पहाड़ों और दुर्गम इलाकों के साथ-साथ आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। यहां रहने वाले माड़िया और मुड़िया जनजातीय समुदायों की जीवनशैली प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। इसका एक उदाहरण गांवों और जंगलों के बीच बने पारंपरिक आस्था स्थल देवगुड़ी में देखने को मिलता है।

भव्य मंदिरों से अलग होती है देवगुड़ी

अबूझमाड़ और बस्तर के कई इलाकों में देवगुड़ी सामान्य मंदिरों से अलग होती है। यहां ऊंचे शिखर या बड़ी पत्थर और सीमेंट की मूर्तियां आम तौर पर नहीं होतीं। गांव के बाहर या जंगल के बीच साधारण छप्पर के नीचे देवगुड़ी बनाई जाती है।

यहां देवताओं के प्रतीक के रूप में लकड़ी के खंभे, विशेष पत्थर, त्रिशूल, लोहे की सांकल और मिट्टी से बने घोड़े या हाथी रखे जाते हैं। आसपास महुआ, सरई और सल्फी जैसे पेड़ भी पाए जाते हैं।

आंगा देव की विशेष मान्यता

देवगुड़ी की परंपरा में आंगा देव का विशेष स्थान माना जाता है। गांव में किसी संकट के समय या नए देवता की स्थापना के दौरान जंगल से पवित्र लकड़ी चुनी जाती है। कई जगह बीजा या सरई की तीन-चार लकड़ियों को जोड़कर पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है।

पूजा के बाद इसे देवता का स्वरूप माना जाता है। विशेष त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर ग्रामीण इसे कंधे पर उठाकर गांव में ले जाते हैं।

देवराही में पेड़ काटने और शिकार पर रोक

देवगुड़ी के आसपास के जंगल को कई स्थानों पर देवराही कहा जाता है। इन क्षेत्रों को धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार यहां पेड़ काटने और शिकार करने पर रोक रहती है।

इस तरह आदिवासी आस्था का संबंध जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। अलग-अलग क्षेत्रों में आंगा पेन, बूढ़ादेव और माटी देव जैसे देवताओं की पूजा की जाती है।

नई फसल का पहला हिस्सा देवता को

कई गांवों में खेती और जंगल से मिलने वाली नई उपज को भी देवगुड़ी से जोड़ा जाता है। नई फसल, महुआ, आम या अन्य उपज का पहला हिस्सा देवता को अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद ही ग्रामीण उसका उपयोग करते हैं।

गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका

देवगुड़ी से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गायता को गांव का धार्मिक प्रमुख माना जाता है और वह पूजा-अनुष्ठान कराता है।

वहीं सिरहा को लेकर स्थानीय मान्यता है कि विशेष धार्मिक अवस्था में उस पर देवता का प्रभाव आता है। बीमारी, संकट या किसी विवाद की स्थिति में कई जगह ग्रामीण पारंपरिक रूप से सिरहा से मार्गदर्शन लेते हैं।

सिर्फ पूजा नहीं, सामाजिक चर्चा का भी केंद्र

कई गांवों में देवगुड़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं है। यह सामाजिक चर्चा और सामुदायिक फैसलों का स्थान भी होती है। गांव के लोग पारिवारिक या सामुदायिक विवादों पर यहां चर्चा करते हैं।

महिलाओं के प्रवेश को लेकर भी सभी जगह एक जैसे नियम नहीं हैं। कुछ देवगुड़ियों में स्थानीय परंपरा के अनुसार महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध या विशेष नियम हो सकते हैं। ये नियम गांव और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होते हैं।

परंपरा और प्रकृति का अनोखा मेल

Chhattisgarh Unique Village: आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद अबूझमाड़ और बस्तर के कई इलाकों में देवगुड़ी की परंपरा आज भी कायम है। इन पारंपरिक आस्था स्थलों को संरक्षित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। देवगुड़ी आदिवासी समाज की आस्था, सामाजिक परंपराओं और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को दर्शाती है। यहां पूजा का स्वरूप भव्य मंदिरों से अलग जरूर है, लेकिन स्थानीय समुदाय के लिए इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद खास है।

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