Monday, August 31, 2026
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हिमालय की 188 झीलें बन सकती हैं तबाही की वजह, करोड़ों लोगों पर खतरा! मोदी सरकार ने शुरू की खास तैयारी

Himalayan Glacial Lake Threat: निशानेबाज न्यूज़ डेस्क-  हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार ने भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। नेपाल-तिब्बत सीमा और सिक्किम में बाढ़ की घटनाओं के बाद अब केंद्र सरकार ने इस खतरे से निपटने की तैयारी तेज कर दी है।सरकार भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 188 बेहद संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (EWS) लगाने की दिशा में काम कर रही है। इसका मकसद झील में अचानक आने वाले बदलावों का पहले पता लगाना और नीचे रहने वाले लोगों को समय रहते चेतावनी देना है।

हिमालयी ग्लेशियल झीलों का खतरा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में करीब 28,043 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है।इनमें से 188 झीलों को बेहद जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। उपलब्ध आकलन के अनुसार इन झीलों से जुड़े संभावित खतरे का असर करीब 3 करोड़ लोगों तक पहुंच सकता है।इनमें सबसे ज्यादा संवेदनशील झीलें सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में बताई गई हैं। दोनों राज्यों में ऐसी 129 झीलें हैं। इसके अलावा लद्दाख-कश्मीर में 26, हिमाचल प्रदेश में 20 और उत्तराखंड में 13 झीलें जोखिम वाली मानी गई हैं।

झील फटी तो कुछ ही समय में बदल सकती है पूरी तस्वीर
Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF उस स्थिति को कहा जाता है, जब ग्लेशियल झील में जमा पानी अचानक प्राकृतिक बांध को तोड़कर तेज रफ्तार से नीचे की ओर बहने लगता है।प्राकृतिक बांध बर्फ, चट्टान या मलबे से बना हो सकता है। इसके कमजोर होने या टूटने पर झील का पानी बेहद तेज बहाव के साथ नीचे आता है।ऐसी स्थिति में नदी किनारे बसे गांव, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और दूसरी जरूरी सुविधाएं कुछ ही समय में प्रभावित हो सकती हैं।
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ग्लेशियर पिघले तो क्यों बढ़ रहा झीलों का आकार?
हिमालयी ग्लेशियल झीलों का खतरा जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा हुआ है। तापमान बढ़ने के कारण कई इलाकों में ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं।इससे ग्लेशियरों के आसपास पानी जमा होकर नई झीलें बन सकती हैं। पहले से मौजूद झीलों का क्षेत्रफल भी बढ़ सकता है।अध्ययनों के अनुसार 1990 से 2018 के बीच ग्लेशियल झीलों की संख्या में करीब 53 फीसदी और उनके सतही क्षेत्रफल में लगभग 51 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।इस बदलाव ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है।

सिक्किम की घटना ने दिखाई खतरे की गंभीरता
Glacial Lake Flood Risk को लेकर सिक्किम की 2023 की घटना एक बड़ी चेतावनी मानी जाती है।4 अक्टूबर 2023 को साउथ ल्होनक झील से GLOF की घटना हुई थी। इसके बाद तीस्ता घाटी में भारी तबाही हुई। उपलब्ध आकलन के मुताबिक इस आपदा में 55 लोगों की मौत हुई और 70 लोग लापता हुए।बाढ़ से सड़क, पुल और हाइड्रोपावर परियोजनाओं समेत कई महत्वपूर्ण ढांचे प्रभावित हुए थे।

नेपाल में भी सामने आया था ऐसा ही खतरा
ग्लेशियल झीलों का खतरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। 16 अगस्त 2024 को नेपाल के थामे गांव में थ्यानबो ग्लेशियल झील से GLOF की घटना सामने आई थी।शुरुआती आकलन में कई इमारतों के तबाह होने की जानकारी सामने आई। बाद के अध्ययन में करीब 135 लोगों के विस्थापित होने और 25 घरों के नष्ट होने की बात सामने आई।बताया गया कि करीब 4.59 लाख घन मीटर पानी दो ग्लेशियल झीलों से बाहर आया था। यह मात्रा लगभग 185 ओलंपिक स्विमिंग पूल के बराबर बताई गई।

अब 188 झीलों पर पहले से मिलेगी चेतावनी
188 ग्लेशियल झीलें अब सरकार की प्राथमिक निगरानी में हैं। प्रस्तावित Early Warning System का मकसद झील के फटने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि खतरा बनने से पहले उसके संकेत पकड़ना है।इसके लिए पानी के स्तर, झील के क्षेत्रफल, आसपास के ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।सैटेलाइट तस्वीरों, सेंसर, रिमोट सेंसिंग और दूसरे वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से इन बदलावों को ट्रैक किया जाएगा।

अलर्ट मिला तो लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने का मौका
Glacial Lake Early Warning System की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि लोगों को अचानक आने वाली बाढ़ से पहले कुछ समय मिल सके।अगर सिस्टम झील में किसी असामान्य बदलाव का संकेत देता है तो संबंधित प्रशासन को अलर्ट भेजा जा सकता है। इसके बाद संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।गांवों में सायरन, मोबाइल अलर्ट, सुरक्षित निकासी रास्ते और राहत केंद्र इस व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी बना सकते हैं।

कई संस्थाएं मिलकर कर रही हैं निगरानी
Himalayan Glacial Lakes की निगरानी और जोखिम का आकलन कई संस्थाओं के स्तर पर किया जा रहा है।NRSC, केंद्रीय जल आयोग (CWC), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), ICIMOD, UNDP, SDC और NSIDC जैसी संस्थाएं ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और अध्ययन से जुड़ी हैं।गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी बेसिन में हजारों ग्लेशियल झीलों की मैपिंग भी की जा चुकी है।

सिर्फ सिस्टम नहीं, जमीन पर तैयारी भी जरूरी
हिमालय में बाढ़ का खतरा देखते हुए केवल Early Warning System लगाना पर्याप्त नहीं होगा। चेतावनी मिलने के बाद तेजी से कार्रवाई करना भी उतना ही जरूरी है।इसके लिए स्थानीय प्रशासन, ग्रामीणों और आपदा राहत टीमों को नियमित रूप से तैयार रखना होगा। सुरक्षित स्थानों की पहचान, निकासी मार्ग, सायरन और स्थानीय स्तर की रेस्क्यू टीम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ बेहद तेजी से नीचे की ओर आती है। ऐसे में चेतावनी के कुछ मिनट या घंटे भी लोगों की जान बचाने में बेहद अहम साबित हो सकते हैं।यही वजह है कि 188 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने की योजना को हिमालयी इलाकों में भविष्य के बड़े बाढ़ जोखिम से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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