Sunday, August 16, 2026
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Child Development: माता-पिता से कमजोर हो सकता है भावनात्मक जुड़ाव: गोद के बजाय मोबाइल से चुप होने की आदत घातक

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Child Development: नई दिल्ली/रायपुर। आधुनिक दौर में व्यस्त जीवनशैली के चलते आजकल अधिकांश माता-पिता बच्चे के रोते ही या उसे व्यस्त रखने के लिए सहजता से मोबाइल फोन या टैबलेट थमा देते हैं। कुछ ही सेकंड में मासूम स्क्रीन के चमकीले दृश्यों में खो जाता है और उसका रोना बंद हो जाता है। लेकिन बाल रोग विशेषज्ञों और वैश्विक शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि माता-पिता की यह तात्कालिक राहत बच्चे के भविष्य के लिए बेहद दंडात्मक और नुकसानदेह साबित हो रही है।

ब्रिटेन की चार प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के शोधकर्ताओं द्वारा शिशुओं और दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्क्रीन टाइम पर की गई व्यापक समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, जीवन के शुरुआती दो वर्षों में बच्चों को जानबूझकर डिजिटल स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना बेहद अनिवार्य है।

भाषा सीखने की गति हो रही है धीमी, ‘मम्मी-पापा’ जैसे शब्द बोलने में भी देरी

चिकित्सा और बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार, जो बच्चे बहुत कम उम्र से ही नियमित रूप से स्क्रीन देखने के आदी हो जाते हैं, उनके भीतर भाषा सीखने और समझने की प्राकृतिक रफ्तार काफी धीमी हो जाती है। ऐसे बच्चे अपने माता-पिता और आसपास के लोगों से संवाद करने के बजाय स्क्रीन की आभासी दुनिया में अधिक रुचि लेने लगते हैं।

इसके दुष्परिणामस्वरूप वे शुरुआती बुनियादी शब्द जैसे ‘मम्मी’ या ‘पापा’ भी सामान्य बच्चों की तुलना में काफी देरी से बोलना शुरू करते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि जन्म के बाद के शुरुआती दो साल शिशु के मस्तिष्क के सबसे तीव्र विकास का समय होते हैं, जिसमें वह इंसानी चेहरों के हाव-भाव देखकर, नई वस्तुओं को छूकर और खेल-कूद के माध्यम से सीखता है; मोबाइल इस पूरी प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर देता है।

माता-पिता के स्पर्श से दूरी और कमजोर होता भावनात्मक जुड़ाव

अध्ययन के चौंकाने वाले निष्कर्षों के मुताबिक, अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों का अपने माता-पिता के साथ होने वाला प्राकृतिक भावनात्मक (इमोशनल) जुड़ाव लगातार कमजोर पड़ रहा है। बच्चे अपनी मां या पिता की ममतामयी गोद और स्पर्श के बजाय मोबाइल स्क्रीन देखकर शांत होने की कृत्रिम आदत विकसित कर लेते हैं।

लंबे समय में यह स्थिति बच्चों के सामाजिक व्यवहार और मानसिक संतुलन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों की नींद का चक्र पूरी तरह खराब हो जाता है, आंखों की रोशनी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, और शारीरिक गतिविधियों में कमी आने के कारण बचपन में ही मोटापे (Obesity) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।

डिजिटल गैजेट्स नहीं, माता-पिता की बातचीत और कहानियां हैं बच्चों की असली जरूरत

बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि आज के डिजिटल युग में स्क्रीन से पूरी तरह अलगाव भले ही कठिन हो, लेकिन दो साल से कम उम्र के अबोध बच्चों को खुद होकर मोबाइल थमाना किसी भी दृष्टिकोण से सही निर्णय नहीं है। इस नाजुक उम्र में बच्चों को किसी कृत्रिम स्क्रीन की नहीं, बल्कि माता-पिता के जीवंत साथ, उनके द्वारा सुनाई जाने वाली लोरियों, कहानियों, आपसी बातचीत और स्नेहपूर्ण स्पर्श की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। यही मानवीय और प्राकृतिक तत्व बच्चों के स्वस्थ मानसिक, शारीरिक और भाषाई विकास की एक मजबूत व अटूट नींव तैयार करते हैं।

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