Thursday, September 10, 2026
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Durg Hospital Negligence: दुर्ग जिला अस्पताल की भयंकर लापरवाही: ब्लड बैंक में मौजूद था 85 यूनिट खून, फिर भी युवती ने तोड़ा दम

Durg Hospital Negligence: दुर्ग। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिला चिकित्सालय से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार कर देने वाली एक बेहद हृदयविदारक और गंभीर घटना सामने आई है। यहाँ अस्पताल के शासकीय ब्लड बैंक में ओ-पॉजिटिव ग्रुप का 85 यूनिट रक्त सुरक्षित रूप से उपलब्ध होने के बावजूद, सिकलिंग बीमारी से पीड़ित एक 21 वर्षीय मासूम युवती को समय पर एक यूनिट खून भी नसीब नहीं हुआ, जिसके कारण उसने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक घटना के बाद पूरे जिले में भारी आक्रोश है। मामले की प्रशासनिक जांच में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अस्पताल प्रबंधन की अक्षम्य लापरवाही उजागर होने के बाद जिला कलेक्टर के निर्देश पर सिविल सर्जन समेत आठ स्वास्थ्य कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

नियमों की आड़ में डोनर के लिए दबाव बनाता रहा अस्पताल प्रबंधन

प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 1 जून को सिकलिंग बीमारी से गंभीर रूप से पीड़ित 21 वर्षीय युवती दीपिका को जिला अस्पताल में आपातकालीन स्थिति में भर्ती कराया गया था। मरीज के शरीर में खून की भारी कमी थी और उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। वीरता और संवेदनशीलता को ताक पर रखकर ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और डॉक्टरों ने नियमों का हवाला दिया और लगातार नया डोनर (रक्तदाता) लाने का दबाव बनाया। बेबस पिता अपनी लाड़ली बेटी की जान बचाने के लिए शहर में डोनर की व्यवस्था करने के लिए दफ्तरों और परिचितों के चक्कर काटता रहा और इसी बीच खून की कमी से दीपिका की सांसें हमेशा के लिए थम गईं।

कलेक्टर द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति की जांच में दोषी पाए गए अफसर

इस अमानवीय घटना के मीडिया में आने के बाद दुर्ग कलेक्टर श्री अभिजीत सिंह ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। उन्होंने तत्काल दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन कर पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए। जांच समिति ने जब ब्लड बैंक के दस्तावेजों और स्टॉक की बारीकी से जांच की, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि जिस समय युवती जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही थी, ठीक उसी समय उसी के ब्लड ग्रुप का 85 यूनिट खून फ्रिज में सुरक्षित रखा हुआ था। समिति की रिपोर्ट में अस्पताल प्रबंधन के लचर रवैये को अक्षम्य अपराध माना गया, जिसके बाद सिविल सर्जन डॉ. आशीषन मिंज सहित आठ स्वास्थ्य कर्मचारियों को 48 घंटे के भीतर जवाब देने का कड़ा नोटिस जारी किया गया है।

बड़े चेहरों को बचाने की कोशिश? कार्रवाई की निष्पक्षता पर दाग

हालांकि, जिला प्रशासन द्वारा की गई इस त्वरित विभागीय कार्रवाई पर भी अब गंभीर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि इस पूरे मामले में जो असली जिम्मेदार चेहरे हैं, उन्हें राजनीतिक या प्रशासनिक रसूख के चलते बचाने की कोशिश की जा रही है। ब्लड बैंक के मुख्य प्रभारी डॉ. जे.पी. मेश्राम और संबंधित विभागाध्यक्ष डॉ. देवेंद्र कुमार साहू को इस दंडात्मक नोटिस के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, जबकि तकनीकी रूप से ब्लड बैंक का सुचारू संचालन और आपातकाल में रक्त उपलब्ध कराने की अंतिम और सीधी जिम्मेदारी इन्हीं दोनों शीर्ष अधिकारियों की थी। अब देखना यह है कि पीड़ित परिवार को वास्तविक न्याय मिलता है या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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