Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी का व्रत इस साल 1 नवंबर, रविवार को रखा जा रहा है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना के लिए अहोई माता की पूजा करती हैं। रायपुर में पूजा का शुभ समय शाम 5:28 बजे से 6:44 बजे तक है। वहीं, तारों के दर्शन का समय करीब शाम 5:51 बजे बताया गया है। अलग-अलग शहरों में पूजा और तारों को देखने का समय बदल सकता है। इस दिन व्रत रखने के साथ अहोई माता की कथा सुनने की भी परंपरा है।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे और सात बहुएं थीं। दीपावली से पहले कार्तिक मास की अष्टमी के दिन घर की बहुएं अपनी ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने गईं। जिस जगह वे मिट्टी निकाल रही थीं, वहां स्याहू माता की मांद थी। खुदाई के दौरान साहूकार की ननद के हाथ से कुदाल लगने पर स्याहू माता का एक बच्चा मर गया। इससे माता क्रोधित हो गईं और उन्होंने ननद की कोख बांधने का श्राप दे दिया।
छोटी बहू ने अपने ऊपर लिया श्राप
ननद की परेशानी देखकर सभी भाभियों से उसकी जगह श्राप स्वीकार करने की विनती की गई, लेकिन किसी ने हामी नहीं भरी। आखिरकार छोटी बहू ने ननद की जगह श्राप अपने ऊपर ले लिया। इसके बाद उसके यहां जो भी बच्चा जन्म लेता, सातवें दिन उसकी मृत्यु हो जाती। लगातार इस दुख से परेशान होकर छोटी बहू ने एक पंडित से इसका उपाय पूछा। पंडित ने उसे सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। उन्हें विश्वास था कि गाय की मदद से वह स्याहू माता को प्रसन्न कर सकेगी।
सुरही गाय की सेवा से मिली मदद
छोटी बहू रोजाना सुरही गाय की सेवा करने लगी। उसकी लगन देखकर एक दिन गाय ने उससे पूछा कि वह किस परेशानी के कारण इतनी सेवा कर रही है। बहू ने अपनी व्यथा सुनाई और कोख खुलवाने में मदद मांगी। सुरही गाय उसे लेकर अपनी सहेली स्याहू माता के पास चल पड़ी।
रास्ते में दोनों ने देखा कि एक सांप गरुड़ पंखनी के बच्चों को डसने जा रहा है। छोटी बहू ने साहस दिखाते हुए बच्चों को बचा लिया। उसकी इस भलाई से प्रसन्न होकर गरुड़ पंखनी ने दोनों को स्याहू माता तक पहुंचा दिया।
स्याहू माता ने दिया संतान का आशीर्वाद
स्याहू माता ने छोटी बहू से अपने सिर की जुएं निकालने को कहा। बहू ने पूरे मन से उनकी सेवा की। इससे प्रसन्न होकर माता ने उसे सात बेटों का आशीर्वाद दिया। तब बहू ने बताया कि उसकी कोख तो श्राप के कारण बंद है। स्याहू माता को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने बहू को श्राप से मुक्त कर दिया।
कथा के अनुसार, घर लौटने पर छोटी बहू को अपने सात बेटे और उनकी पत्नियां मिलीं। वह बहुत खुश हुई और अहोई माता की पूजा कर उजमन किया। तभी से अहोई अष्टमी पर व्रत कथा सुनने और संतान की खुशहाली की प्रार्थना करने की परंपरा प्रचलित है।
अहोई माता से करें संतान की खुशहाली की प्रार्थना
अहोई अष्टमी पर माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य व सुखद भविष्य की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत के साथ कथा सुनना भी शुभ माना जाता है। साहूकार की छोटी बहू की यह कथा मातृत्व, सेवा, धैर्य और आस्था का संदेश देती है।