CG High Court Verdict: रायगढ़ पुलिस की मनमानी पर बिलासपुर हाईकोर्ट की रोक, बिना मर्जी नहीं होगा कोई भी साइंटिफिक टेस्ट

CG High Court Verdict: गौरी शंकर गुप्ता/बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कानून और नए विधिक प्रावधानों की आड़ में रायगढ़ पुलिस द्वारा संदिग्धों से जबरन सच उगलवाने के लिए अपनाए जा रहे ‘शॉर्टकट’ और मानसिक प्रताड़ना के तौर-तरीकों पर बेहद कड़ा और सख्त रुख अपनाया है। माननीय मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक ऐतिहासिक विधिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि देश के संवैधानिक और नागरिक अधिकारों के तहत किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्र सहमति के बिना उसे नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ या किसी अन्य वैज्ञानिक जांच के लिए विवश नहीं किया जा सकता।

चक्रधरनगर पुलिस ने बिना सबूत 18 दिनों तक किया ‘मानसिक टॉर्चर’

यह पूरा संवेदनशील मामला रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने एक हत्या और साक्ष्य छुपाने के मामले में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (1) और 238(A) के तहत मुकदमा दर्ज किया था। लेकिन जांच के नाम पर पुलिसिया तंत्र ने विधिक नियमों को ताक पर रख दिया। संदेह के आधार पर ग्राम बेहरापाली निवासी किसान लक्ष्मीनारायण पटेल और ग्राम महापल्ली निवासी अर्धना भगत को पूछताछ के लिए बुलाया गया। चौंकाने वाली विसंगति यह थी कि इन पीड़ितों का नाम न तो मुख्य एफआईआर में दर्ज था और न ही पुलिस की 16 जून 2026 की विधिक जांच रिपोर्ट में इनके खिलाफ कोई साक्ष्य मिला था।

इसके बावजूद, नए कानून ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) के तहत बिना कोई विधिवत कानूनी नोटिस जारी किए, दोनों नागरिकों को लगातार 18 दिनों तक थाने बुलाकर सुबह से रात तक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। पीड़ितों का आरोप है कि पुलिस ने दबाव डालकर उनसे ‘सुपुर्दनामा’ पर जबरन हस्ताक्षर कराए और बिना किसी उचित विधिक जब्ती प्रक्रिया के उनके मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए।

बिना कोर्ट की अनुमति खुद ही तय कर दिया नार्को टेस्ट

हद तो तब हो गई जब रायगढ़ पुलिस ने बिना किसी सक्षम विधिक/न्यायिक अनुमति और पीड़ितों की मर्जी के, बीते 20 जून को एक एकतरफा नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस के जरिए पीड़ितों को 22 और 23 जून 2026 को रायपुर में स्टेट फॉरेंसिक लैब में ब्रेन मैपिंग, पॉलीग्राफ और नार्को-एनालिसिस टेस्ट के लिए उपस्थित होने का दंडात्मक फरमान सुनाया गया। पुलिस के इस अवैध विधिक दबाव से तंग आकर आखिरकार पीड़ितों ने उच्च न्यायालय की शरण ली।

हाईकोर्ट का कड़ा विधिक संदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने पीड़ितों को बड़ी राहत प्रदान करते हुए उनके नार्को, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग परीक्षणों पर तत्काल प्रभाव से विधिक रोक (Stay) लगा दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, “जांच एजेंसी किसी भी नागरिक को नार्को-एनालिसिस या ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यदि ऐसे परीक्षण की अत्यंत आवश्यकता है, तो वह केवल संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र, स्पष्ट और पूरी जानकारी के साथ लिखित सहमति के आधार पर ही हो सकता है।” इसके साथ ही, कोर्ट ने रायगढ़ पुलिस को सख्त हिदायत दी है कि वे जांच के नाम पर निर्दोष नागरिकों के साथ इस तरह की गैर-कानूनी बर्बरता तुरंत बंद करें।

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