Jharkhand News :पत्नी को प्रेमी के हवाले किया पति ने, गांव की पंचायत में सिंदूर पोंछा और चूड़ियां तोड़ीं, फिर करवाई शादी

Sanjay Sahu
Jharkhand News

Jharkhand News : झारखंड के पाकुड़ जिले के हिरणपुर थाना क्षेत्र के घाघरजानी गांव में एक असामान्य प्रेम कहानी ने गांव से लेकर सोशल मीडिया तक बहस को जन्म दे दिया है। 45 वर्षीय दो बच्चों की मां और 21 वर्षीय युवक के बीच वर्षों से चल रहे प्रेम संबंध ने उस वक्त नया मोड़ लिया जब महिला के पति ने खुद पंचायत बुलवाकर पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करा दी।

Jharkhand News :शुरुआत तब हुई जब पति को अपनी पत्नी के प्रेम-प्रसंग का संदेह हुआ, जो समय के साथ यकीन में बदल गया। इसके बाद पति ने गांव की पंचायत बुलाई और सबके सामने पारंपरिक विवाह विच्छेद की प्रक्रिया अपनाई — पत्नी के माथे से सिंदूर मिटाया, चूड़ियां तोड़ीं, और उसे प्रतीकात्मक रूप से ‘विधवा’ घोषित कर दिया। इसके तुरंत बाद महिला को मंच पर उसके प्रेमी के साथ लाया गया और ग्रामीणों की मौजूदगी में दोनों का विवाह संपन्न कराया गया।

Jharkhand News :इस विवाह में न कोई रस्म थी, न ढोल-नगाड़े, लेकिन सामाजिक रूप से यह एक बड़ा कदम था। बताया गया कि महिला और युवक के बीच लंबे समय से प्रेम संबंध था, जिसे गांव के कुछ लोग पहले से जानते थे। लेकिन इस तरह सार्वजनिक रूप से विवाह कराना गांव के लिए पहली बार था।

Jharkhand News :इस घटना ने दो तरह की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है। कुछ लोग इसे प्रेम की स्वीकृति और सामाजिक ईमानदारी का उदाहरण मानते हैं। उनका कहना है कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो रिश्ते को जबरदस्ती ढोने से बेहतर है कि उसे एक नया स्वरूप दे दिया जाए। वहीं, दूसरी ओर, परंपरावादी विचारधारा वाले लोग इसे पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक ढांचे के लिए खतरा मान रहे हैं। उनके मुताबिक, ऐसे कदम पारिवारिक अस्थिरता और सामाजिक अराजकता को जन्म दे सकते हैं।

Jharkhand News :घटना का वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है। कोई इसे ग्रामीण समाज की बदलती सोच मान रहा है, तो कोई संस्कृति पर चोट के रूप में देख रहा है। यह घटना सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की जटिलताओं को भी उजागर करती है।

Jharkhand News :अब सवाल यह है कि क्या यह एक साहसिक निर्णय था या पारिवारिक जिम्मेदारी से बचने का रास्ता? क्या यह प्रेम की जीत है या सामाजिक ढांचे की अनदेखी? जवाब समय और समाज के मंथन में छिपे हैं।

 

 

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