बालोद:- लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है, जो समाज की विसंगतियों और कुरीतियों पर चोट कर जनजागरूकता फैलाती है। पत्रकार का दायित्व केवल सूचनाएँ देना ही नहीं बल्कि शासन–प्रशासन की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन कर समाज को सही दिशा में मार्गदर्शन देना भी है। मगर वर्तमान समय में पत्रकारिता से जुड़े लोग स्वयं ही उपेक्षा और शोषण का सामना कर रहे हैं। आज पत्रकार पेशेवर और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर अनेक चुनौतियों से घिरे हुए हैं।
आज का पत्रकार खबरों की खोजबीन और प्रसारण के साथ-साथ अपने पेशेवर अधिकारों की रक्षा के लिए भी लगातार संघर्षरत है। कई मीडिया संस्थान उनसे लंबे समय तक काम तो लेते हैं, परंतु उचित वेतन और सुविधाएँ देने में कंजूसी करते हैं। इसका सीधा असर उनके जीवन स्तर पर दिखाई देता है। परिवार का पालन-पोषण, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना भी उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसी आर्थिक असुरक्षा ने पत्रकारों की स्थिरता और आत्मबल को गहरी चोट पहुँचाई है।
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इसके अलावा, पत्रकारों पर मानसिक और शारीरिक दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। चौबीसों घंटे सक्रिय रहना, हर वक्त खबर के पीछे दौड़ना और अनियमित जीवनशैली ने उन्हें तनाव, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों की ओर धकेल दिया है। नींद की कमी और असंतुलित खानपान उनके पेशेवर प्रदर्शन को भी प्रभावित कर रहे हैं।
फिर भी इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद पत्रकार समाज के लिए सतत कार्यरत रहते हैं। वे भ्रष्टाचार, अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाते हैं और लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने का साहस दिखाते हैं। यही वजह है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है। किंतु यदि पत्रकारों के अधिकार और मान-सम्मान की सुरक्षा नहीं हुई तो यह चौथा स्तंभ कमजोर हो सकता है।
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पत्रकार महासंघ छत्तीसगढ़ ने इस संदर्भ में सभी पत्रकारों से आह्वान किया है कि वे एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करें। संगठन का मानना है कि जब तक पत्रकार सामूहिक रूप से अपने अधिकारों और समस्याओं पर दबाव नहीं बनाएँगे, तब तक न्याय और उचित हक़ नहीं मिल पाएँगे। अब समय आ गया है कि व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष के जरिये अपने हितों की रक्षा की जाए। हमें संगठित होकर स्वतंत्र और सशक्त पत्रकारिता की ओर कदम बढ़ाना होगा ताकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मजबूती और सम्मान के साथ कायम रह सके।











