निशानेबाज न्यूज़ डेस्क : फिल्म की कहानी राजा (प्रभास) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) के साथ सादा जीवन जी रहा है। अल्जाइमर से जूझ रही दादी को बार-बार अपने खोए हुए पति कनक राजू (संजय दत्त) के सपने आते हैं। इन्हीं सपनों के चलते राजा अपने दादा की तलाश में निकल पड़ता है, जो उसे एक रहस्यमयी और डरावने महल तक पहुंचा देती है। इसके बाद फिल्म हॉरर, कॉमेडी और फैंटेसी का मिश्रण बन जाती है।
निर्देशन: आइडिया अच्छा, लेकिन एक्सीक्यूशन कमजोर
निर्देशक मारुति के पास एक दिलचस्प कॉन्सेप्ट था, लेकिन स्क्रीनप्ले में जरूरत से ज्यादा चीजें ठूंस दी गई हैं। झाड़-फूंक, हिप्नोटिज्म, तंत्र-मंत्र और सुपरनैचुरल एलिमेंट्स के कारण फिल्म तय नहीं कर पाती कि उसे डराना है, हंसाना है या चौंकाना है। फिल्म की 3 घंटे की लंबाई भी इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर सामने आती है।
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एक्टिंग: प्रभास का लाइट मोड सबसे बड़ी ताकत
प्रभास का यह अवतार फिल्म की जान है। उनकी कॉमिक टाइमिंग और सहज अभिनय दिल जीत लेता है। संजय दत्त और जरीना वहाब ने भी अपने किरदारों को मजबूती दी है। हालांकि, तीनों हीरोइनों की मौजूदगी सिर्फ ग्लैमर तक सीमित रह जाती है, जिससे कहानी को खास फायदा नहीं मिलता।
क्या है खास और कहां चूक गई फिल्म
फिल्म के सेट, विजुअल्स और सिनेमैटोग्राफी शानदार हैं। कुछ सीन, खासकर हिप्नोटिज्म और हॉस्पिटल सीक्वेंस, उम्मीद जगाते हैं, लेकिन फिल्म उन्हें पूरी तरह भुना नहीं पाती। भारी बजट के बावजूद कहानी और संदेश कमजोर महसूस होते हैं।
फाइनल वर्डिक्ट
‘द राजा साब’ एक वन-टाइम वॉच है—खासकर प्रभास के कट्टर फैंस के लिए। अगर आप उनसे सिर्फ हल्के-फुल्के अंदाज में मिलने थिएटर जा रहे हैं, तो निराश नहीं होंगे। लेकिन मजबूत कहानी और यादगार अनुभव की उम्मीद रखने वालों को फिल्म थोड़ा अधूरा सा एहसास दे सकती है।











