ईसबगोल की बुवाई का सही समय
रबी सीजन में किसानों के लिए ईसबगोल की खेती आमदनी का एक विकल्प बन सकती है। राजस्थान के जालोर जिले में इसकी बुवाई शुरू हो गई है। यहां की जलवायु और मिट्टी को इस फसल के अनुकूल माना जाता है। कृषि संबंधी जानकारी के मुताबिक, अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर के पहले पखवाड़े तक इसकी बुवाई की जा सकती है। 15 नवंबर तक का समय इसके लिए उपयुक्त बताया जाता है, हालांकि सही समय स्थानीय मौसम और खेत की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
कैसी मिट्टी में अच्छी होती है खेती?
ईसबगोल की खेती के लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था होना जरूरी है, क्योंकि जलभराव से फसल को नुकसान पहुंच सकता है। लगातार बारिश और खेत में ज्यादा नमी रहने से भी पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसलिए बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह तैयारी करें और मिट्टी की स्थिति के अनुसार बीज डालें।
कम पानी में होती है सिंचाई
ईसबगोल ऐसी फसल है, जिसमें जरूरत के अनुसार सीमित सिंचाई की जाती है। शुरुआती दौर में बीजों के अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी होता है। जालोर के किसान सोहनलाल के मुताबिक, बुवाई के बाद फव्वारा विधि से सिंचाई करना उपयोगी रहता है। इससे पानी खेत में समान रूप से पहुंच सकता है। हालांकि, सिंचाई का अंतराल मिट्टी, तापमान और मौसम के हिसाब से तय करना चाहिए। खेत में पानी जमा होने से बचाएं।
100 से 125 दिन में तैयार हो सकती है फसल
ईसबगोल की फसल सामान्य तौर पर करीब 100 से 125 दिनों में तैयार हो जाती है। वास्तविक अवधि मौसम, मिट्टी और फसल की देखभाल के अनुसार बदल सकती है। किसानों को पौधों की बढ़वार पर नजर रखने के साथ समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान देना चाहिए। अच्छी तैयारी और उचित देखभाल से फसल की गुणवत्ता बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।
ईसबगोल की मांग क्यों रहती है?
ईसबगोल के बीजों से मिलने वाली भूसी का इस्तेमाल पाचन से जुड़े कई उत्पादों में किया जाता है। इसका उपयोग कब्ज से राहत के लिए बनाए जाने वाले उत्पादों में भी आम है। इसके अलावा खाद्य और औषधीय उत्पादों में भी ईसबगोल का इस्तेमाल होता है। जालोर जैसे क्षेत्रों में अनुकूल जलवायु के कारण इसकी खेती की जाती है। फिर भी खेती शुरू करने से पहले किसानों को स्थानीय बाजार में मांग, बीज की गुणवत्ता, उत्पादन लागत और संभावित बिक्री मूल्य की जानकारी जरूर लेनी चाहिए, ताकि वे अपनी जमीन और संसाधनों के हिसाब से फैसला कर सकें।