CGPSC Paper Leak Case: निशानेबाज न्यूज़ डेस्क- छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग यानी CGPSC पेपर लीक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ा कदम उठाते हुए अदालत में चार्जशीट दाखिल की है। एजेंसी ने पूर्व CGPSC अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, उत्कर्ष चंद्राकर और तत्कालीन अपर कलेक्टर चेतन बोरघरिया के खिलाफ चालान पेश किया है। चार्जशीट के साथ बड़ी संख्या में दस्तावेज और जांच से जुड़ी सामग्री भी अदालत के सामने रखी गई है।ED की यह कार्रवाई कथित पेपर लीक, चयन प्रक्रिया में अनियमितता और उससे जुड़े पैसों के लेन-देन की जांच का हिस्सा है। एजेंसी पहले ही तीनों आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई कर चुकी है। हालांकि, चार्जशीट में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अंतिम फैसला अदालत द्वारा साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
ED ने अदालत में दाखिल चालान के साथ करीब 99 पेज की समरी पेश की है। इसके अलावा जांच से जुड़े लगभग 3700 पेज के सहायक दस्तावेज भी लगाए गए हैं।बताया गया है कि इन दस्तावेजों में कथित वित्तीय लेन-देन, डिजिटल साक्ष्य, रिकॉर्ड और जांच के दौरान सामने आई अन्य जानकारियां शामिल हैं। एजेंसी का फोकस कथित अपराध से जुड़े पैसों के स्रोत और उनके लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने पर भी है।
टामन सोनवानी पर ED ने लगाए ये आरोप
ED के अनुसार, टामन सिंह सोनवानी के CGPSC अध्यक्ष रहने के दौरान परीक्षा प्रक्रिया में कथित तौर पर अनियमितताएं की गईं। एजेंसी का आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के लिए प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने और चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई।जांच में डिप्टी कलेक्टर और DSP जैसे पदों पर चयन से जुड़े आरोपों की भी पड़ताल की गई है। हालांकि, ये आरोप ED की जांच और चार्जशीट में दर्ज दावों पर आधारित हैं। अदालत में इन आरोपों की पुष्टि होना अभी बाकी है।
भर्ती नियम में ‘nephew’ शब्द हटाने की भी जांच
मामले में भर्ती नियमों में कथित बदलाव का एक पहलू भी सामने आया है। ED के मुताबिक, 2021 में नियमों में बदलाव के दौरान परिवार की परिभाषा से ‘nephew’ शब्द हटा दिया गया था।जांच एजेंसी का आरोप है कि नियम में यह बदलाव कुछ रिश्तेदारों के चयन से जुड़ी कथित योजना का हिस्सा था। ED ने इस बदलाव और उससे जुड़े घटनाक्रम को भी अपनी जांच में शामिल किया है।
चेतन बोरघरिया के बैंक खाते में 66.74 लाख का दावा
ED की जांच में कथित वित्तीय लेन-देन भी अहम हिस्सा है। एजेंसी के मुताबिक, चेतन बोरघरिया के बैंक खाते में संबंधित अवधि के दौरान 170 लेन-देन के जरिए कुल 66.74 लाख रुपये की नकद जमा का पता चला।एजेंसी ने चेतन बोरघरिया और उत्कर्ष चंद्राकर के बीच हुए कथित वित्तीय लेन-देन की भी जांच की है। ED इस बात की पड़ताल कर रही है कि इन पैसों का संबंध कथित अपराध से हुई आय से था या नहीं।
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उत्कर्ष चंद्राकर की भूमिका भी जांच के घेरे में
ED ने 1 सितंबर 2026 को रायपुर, दुर्ग और जशपुर में पांच स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया था। इसके बाद उत्कर्ष चंद्राकर को गिरफ्तार किया गया था। एजेंसी के अनुसार, तलाशी के दौरान दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस, वित्तीय रिकॉर्ड और संपत्ति से जुड़े कागजात बरामद किए गए।ED का आरोप है कि अभ्यर्थियों से कथित तौर पर पैसे लेकर प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने और चयन में मदद का भरोसा दिया गया था। अब एजेंसी इन दावों से जुड़े वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को भी चार्जशीट में सामने रख रही है।
11 सितंबर को गिरफ्तार हुए थे चेतन बोरघरिया
चेतन बोरघरिया पहले मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी यानी OSD के रूप में काम कर चुके हैं। बाद में उन्हें बलरामपुर-रामानुजगंज में अपर कलेक्टर की जिम्मेदारी दी गई थी।ED ने उन्हें 11 सितंबर 2026 को गिरफ्तार किया था। पूछताछ के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी। अब उनके खिलाफ भी चार्जशीट दाखिल की गई है।
CBI की जांच के बाद ED ने संभाला मनी ट्रेल
CGPSC की वर्ष 2020 और 2021 की राज्य सेवा परीक्षाओं से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच पहले राज्य की आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा और एंटी करप्शन ब्यूरो की FIR से शुरू हुई थी।बाद में CBI ने मामले की जांच संभाली और टामन सिंह सोनवानी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की। ED इसी मामले से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय लेन-देन की जांच कर रही है।
अब अदालत में होगी आरोपों और सबूतों की जांच
CGPSC पेपर लीक मामला कथित प्रश्नपत्र लीक, चयन प्रक्रिया में हेरफेर और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का दावा है कि कुछ अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।ED की चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब अदालत में पेश दस्तावेजों और साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को अदालत द्वारा तय अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। आगे की न्यायिक प्रक्रिया में यह स्पष्ट होगा कि जांच एजेंसी के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों पर अदालत का क्या निष्कर्ष निकलता है।







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