Tuesday, September 8, 2026
Home National Supreme Court Strict Mandate on Live Stream Videos: सोशल मीडिया पर अदालत...

Supreme Court Strict Mandate on Live Stream Videos: सोशल मीडिया पर अदालत का वीडियो पोस्ट किया तो होगी जेल-कार्रवाई; सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश

Supreme Court Railway TTE
Supreme Court Railway TTE

Supreme Court Strict Mandate on Live Stream Videos: नई दिल्ली। यदि आप सोशल मीडिया या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुप्रीम कोर्ट या देश के किसी भी हाई कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग का वीडियो या ऑडियो शेयर करते हैं, तो अब आपको अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को बिना पूर्व इजाजत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने, उसमें फेरबदल (एडिटिंग) करने और उससे कमाई (मॉनेटाइजेशन) करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।

यह महत्वपूर्ण एवं दूरगामी आदेश भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

बिना अनुमति इन गतिविधियों पर रहेगा पूर्ण प्रतिबंध

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि संबंधित अदालत की पूर्व लिखित मंजूरी के बिना निम्नलिखित कार्यों पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी:

  • अपलोडिंग व रीपोस्टिंग: सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट की लाइव-स्ट्रीम की गई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया पर पोस्ट, रीपोस्ट या शेयर करना।

  • क्लिप्स काटना व एडिटिंग: लाइव सत्र से छोटे-छोटे वीडियो क्लिप्स निकालना, फुटेज में संपादन (एडिटिंग) करना या उसे अलग तरीके से पेश करना।

  • मॉनेटाइजेशन (व्यावसायिक उपयोग): कोर्ट कार्यवाही के वीडियो को यूट्यूब या अन्य डिजिटल माध्यमों पर चलाकर उससे किसी भी प्रकार का आर्थिक लाभ या कमाई करना।

किसकी अनुमति होगी अनिवार्य?

शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि यदि किसी भी व्यक्ति या संस्था को कोर्ट कार्यवाही से जुड़ी फुटेज या सामग्री का उपयोग करना है, तो उन्हें इसके लिए पूर्व इजाजत लेनी होगी:

  1. सुप्रीम कोर्ट के मामलों में: सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल (Secretary General) से लिखित मंजूरी।

  2. हाई कोर्ट के मामलों में: संबंधित हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) की अनुमति।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि इस आदेश की जानकारी आम जनता तक पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल इसे अपनी-अपनी आधिकारिक वेबसाइट्स पर सार्वजनिक रूप से जारी करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाया यह सख्त कदम?

पीठ का मानना है कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर जजों और वकीलों के बीच की बहस की छोटी-छोटी क्लिप्स काटकर, उन्हें संदर्भ से बाहर (Out of Context) करके और सनसनीखेज हेडलाइंस के साथ वायरल किया जा रहा था।

इस तरह के अधूरे, संपादित और बदले हुए वीडियो न केवल आम जनता के बीच गलतफहमी और भ्रम फैलाते हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और गरिमा को भी गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। अतः न्यायिक गरिमा बनाए रखने के लिए इस पर तत्काल रोक लगाना अनिवार्य था।

न्यूज रिपोर्टिंग पर नहीं पड़ेगा कोई असर

सर्वोच्च न्यायालय ने पत्रकारिता के अधिकारों का ध्यान रखते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि इस आदेश का समाचारों की तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

प्रिंट, टीवी और मान्यता प्राप्त डिजिटल मीडिया पहले की ही तरह अदालत की सुनवाई और दलीलों से जुड़ी खबरें प्रकाशित और प्रसारित कर सकेंगे। यह रोक केवल ऑडियो-वीडियो फुटेज के अनधिकृत इस्तेमाल, शेयरिंग और उससे व्यावसायिक कमाई करने पर ही प्रभावी होगी।

केंद्र और राज्य सरकारों से मांगा जवाब

यह लैंडमार्क फैसला उस याचिका पर आया है जिसमें अदालती कार्यवाही के अनधिकृत प्रसारण और उससे कमाई करने पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब सरकारों को यह स्पष्ट करना होगा कि इंटरनेट व डिजिटल स्पेस में इस प्रकार के अनधिकृत फैलाव को रोकने के लिए क्या कड़े कानूनी तंत्र या व्यवस्था लागू की जा सकती है।

Share The News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here