TET Exam 2026: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) के मामलों में एक अत्यंत संवेदनशील और युगांतकारी विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है। हाईकोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति एन. के. चन्द्रवंशी की एकलपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि कोरोना महामारी जैसी वैश्विक विभीषिका के कारण यदि शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) समय पर आयोजित नहीं हो सकी, तो इसका खामियाजा और नुकसान अनुकंपा नियुक्ति के पात्र आवेदक को भुगतने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने इस प्रशासनिक शिथिलता और असंवेदनशीलता को आड़े हाथों लेते हुए पंचायत विभाग द्वारा जारी 6 दिसंबर 2022 के अयोग्यता आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। साथ ही, संबंधित उच्चाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे आवेदक के प्रकरण पर विधि अनुसार पुनर्विचार कर आगामी 45 दिनों के भीतर हर हाल में अंतिम निर्णय लें।
समय पर DLEd पास किया, पर कोरोना ने रोकी राह; विभाग ने ठहरा दिया था अयोग्य
मामले के आधिकारिक विधिक विवरण के अनुसार, यह पूरा विवाद धमतरी जिले के निवासी वासुदेव साहू से जुड़ा हुआ है। वासुदेव के पिता शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे, जिनका वर्ष 2017 में सेवाकाल के दौरान ही आकस्मिक निधन हो गया था। पिता के साये के उठने के बाद वासुदेव ने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन प्रस्तुत किया था। तत्कालीन नियमों के तहत प्रशासन ने उन्हें आवश्यक शैक्षणिक योग्यता पूर्ण करने के लिए 3 वर्ष की समय-सीमा प्रदान की थी।
याचिकाकर्ता ने तय समय के भीतर ही डी.एल.एड. (D.El.Ed.) की कठिन व्यावसायिक परीक्षा तो उत्तीर्ण कर ली, लेकिन मार्च 2020 में होने वाली आवश्यक शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) देशव्यापी कोविड-19 लॉकडाउन और महामारी के कारण सरकार द्वारा निरस्त कर दी गई। इसके बाद जब स्थितियां सामान्य हुईं, तो जनवरी 2022 में आयोजित परीक्षा में वासुदेव ने प्रथम प्रयास में ही सफलता प्राप्त कर ली। इसके बावजूद, पंचायत विभाग के आला अधिकारियों ने नियमों की लकीर पीटते हुए निर्धारित अवधि में योग्यता प्राप्त न करने का दोष मढ़कर उनकी अनुकंपा नियुक्ति का वैध दावा सिरे से खारिज कर दिया था।
परिस्थिति अभ्यर्थी के नियंत्रण से बाहर थी, सुप्रीम कोर्ट की राहत के निर्देश लागू
पीड़ित वासुदेव साहू ने प्रशासनिक तंत्र की इस नाइंसाफी को अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर चुनौती दी। मामले की गहन सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति एन. के. चन्द्रवंशी की एकलपीठ ने माना कि कोविड-19 के दौरान परीक्षाओं का समय पर न होना एक ऐसी असाधारण परिस्थिति थी, जो पूरी तरह से अभ्यर्थी के नियंत्रण से बाहर थी। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि जब राज्य शासन स्वयं परीक्षा आयोजित करने में असमर्थ था, तो किसी नागरिक को उसके अधिकारों से वंचित कैसे किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में रेखांकित किया कि कोविड काल के दौरान विभिन्न कानूनी समय-सीमाओं में छूट प्रदान करने के संबंध में देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा जारी किए गए मार्गदर्शक सिद्धांत इस मामले में भी पूरी तरह प्रभावी और लागू होंगे। बिलासपुर हाईकोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद अब प्रदेश के सैकड़ों अन्य अनुकंपा आश्रितों के लिए भी बंद दरवाजे खुल गए हैं, जो लंबे समय से विभागों की कागजी जटिलताओं और तकनीकी अड़चनों के कारण भटक रहे थे।







