Tuesday, September 1, 2026
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Devbhoomi : पंच केदार की पौराणिक कथा: उत्तराखंड में क्यों गुप्त रूप से विराजमान हैं भोलेनाथ

Devbhoomi : उत्तराखंड। देवभूमि उत्तराखंड को भगवान शिव का वास स्थल माना जाता है। कैलाश पर्वत पर उनका निवास और कण-कण में उनकी उपस्थिति इस राज्य को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि शिव यहां विभिन्न रूपों में क्यों विराजमान हैं और उनकी यह उपस्थिति ‘गुप्त’ क्यों कहलाती है? इस रहस्य के पीछे एक प्राचीन और महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है जो महाभारत काल से जुड़ी हुई है।

पंच केदार की कथा, क्या पांडवों ने बनवाए थे ये मंदिर? - कहानी स्टूडियोयह कहानी महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद शुरू होती है। युद्ध में अपने ही बंधु-बांधवों की हत्या (गोत्र-हत्या) के पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव व्याकुल थे। वे मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर भगवान शिव की शरण में जाना चाहते थे। हालांकि, भगवान शिव पांडवों के इस कृत्य से अप्रसन्न थे और उन्हें सीधे दर्शन नहीं देना चाहते थे। शिव पांडवों से बचने के लिए हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में चले गए।

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पांडवों ने उन्हें खोजना शुरू किया और पीछा करते हुए वे वर्तमान रुद्रप्रयाग जिले में पहुंचे। पांडवों से बचने के लिए, भगवान शिव ने सबसे पहले एक स्थान पर स्वयं को गुप्त रखा, जिसे आज ‘गुप्तकाशी’ के नाम से जाना जाता है। पांडवों ने उन्हें यहाँ भी ढूँढ लिया। इसके बाद, शिव वहाँ से निकलकर केदारनाथ की ओर बढ़े, जहाँ उन्होंने पांडवों को भ्रमित करने के लिए एक बैल (महिष) का रूप धारण कर लिया और पशुओं के झुंड में शामिल हो गए।देवभूमि उत्तराखंड स्थित पंचबद्री, पंचकेदार, पंचप्रयागों का जानें महात्म्य

पांडवों में सबसे शक्तिशाली भीम ने अपनी सूझबूझ से भगवान शिव को पहचान लिया। भीम ने दो विशाल पत्थरों को अपने पैरों के बीच फैला दिया ताकि सभी पशु उसके नीचे से निकल सकें। भगवान शिव रूपी बैल ने भीम के पैरों के नीचे से जाने से मना कर दिया। जैसे ही भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, वह बैल जमीन में समाने लगा। भीम ने तुरंत बैल की पीठ का हिस्सा (कूबड़) पकड़ लिया और उन्हें जाने नहीं दिया।

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कहा जाता है कि भगवान शिव ने पांडवों की दृढ़ता और भक्ति को देखते हुए उन्हें दर्शन दिए और उन्हें पाप से मुक्त किया। जिस स्थान पर शिव का यह कूबड़ दिखाई दिया, वहीं पर केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। इसके बाद, बैल रूपी शिव के शरीर के शेष भाग चार अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जो सामूहिक रूप से ‘पंच केदार’ कहलाते हैं। इन पाँचों स्थानों पर शिव के शरीर के अंश पूजे जाते हैं, जो उनकी गुप्त रूप से विराजमान होने की कहानी को दर्शाता है।

गुप्तकाशी यात्रा गाइड 2024 - स्थान और कैसे पहुंचें पूरी जानकारी?इस तरह, उत्तराखंड में भगवान शिव का गुप्त रूप से विराजमान होना केवल एक मान्यता नहीं, बल्कि एक पौराणिक घटना है जो त्याग, प्रायश्चित्त और अंततः भगवान की कृपा को दर्शाती है। यह कथा आज भी इस देवभूमि में शिवभक्तों के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है।

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